Saturday, 11 February 2012

प्यार ,,प्यार,, प्यार…


ॠतुराज बसंत अपने पूरे शबाब पर है॥और मौसम की खूबसूरत देखते ही बन रही है॥गुलाबी ठंड भाने लगी है और गुनगुनी धूप लुभाने लगी है।बागों में बहार आ गई है और एक खुशनुमा सा अहसास सबके दिलों पर खुद-ब-खुद छाया हुआ है॥ कुल मिलाकर पूरा समां ही ऐसा सुहाना है कि, किसी को भी प्यार हो जाये॥
       दो दिन बाद ‘वैलेंटाईन डे” नामक विश्व व्यापी प्रेम दिवस है और युवाओं की अपनी दुनियां में त्यौहारों सा माहौल है। कार्ड्स और तोहफ़े वालों की खुशी का ठिकाना नही है। और सबसे अधिक चांदी फूल वालों की होगी जिनके पास लाखों के ऑर्डर होंगे॥प्रेमियों के लिये ‘आरक्षित’ यह उत्सव अब सीमायें लांघ चुका है और दोस्त, पति-पत्नी और आपस में कोई रिश्ता ना रखने वाले ; भी एक-दूसरे को फूल और उपहार देने लगे है।
     पता नही कब और कैसे ‘ये दिन’ इस कदर लोकप्रिय हो गया??लोगों को अब एक-दूजे के साथ समय बिताने के लिये अवसर चाहिये,,इसलिये ऊटपटांग दिवसों का आयोजन अब आम हो गया है। आज प्रत्येक वस्तु और बात मीडिया के इर्द-गिर्द घूमती रहती है,इसलिए उन्हें ही सर्वाधिक श्रेय देना चाहिए किसी को भी लोकप्रिय बनाने में। प्रेमी मिलें ,बिछ्डें, रोयें, हंसें, कोई उनका समर्थन करे या विरोध; कुछ भी कैमरे से छिपा नही है। साधारण सी बात भी दुहराव के कारण खबर बन जाती है। इतने विरोधों के बावज़ूद प्यार के पंछियों की उडान में कोई कमी नही आती है। जिनको मिलना है,वो मिल ही लेंगे। भारतीय संस्कारों  की दुहाई देने वाले टीवी चैनल्स 14 फ़रवरी के लिये विशेष कार्यक्रम तैयार कर रहे है और पत्रिकाओं ने ‘प्रेम-विशेषांक’ जारी कर दिये होंगे। और सर्वाधिक उत्साही मोबाईलधारियों में होड लग जाएगी उस दिन;सबसे नया,अनोखा और पहला मैसेज भेजने के लिये। फ़िर सारे मैसेज कुछ देर बाद सभी के इनबॉक्स में होंगे। कुल मिलाकर प्यार व्यवसाय बन गया है और मन की शाश्वत अनुभूति का सभी लाभ उठाना चाह रहे हैं।
       अब विचारणीय बिंदु ये है कि जिसके लिये ये सारा तमाशा किया जाता है उसका क्या हाल है,अर्थात प्रेम का क्या हाल है? मेरे विचार से तो प्यार आज भी वैसे ही होता और पनपता है ,जैसे पहले हुआ करता था। बस अंतर इतना आया है कि प्रेम ने व्यवहारिकता सीख ली है,वर्जनाएं टूटी है और रिश्तों का टूटना अब आम खबर है। आज के प्रेमी जानते है कि बिना कैरियर के प्यार पाना मुश्किल है और अगर भाग्य से मिल भी जाये तो शायद उसकी कीमत कम होती है। लोग प्यार करते है फ़िर घरवालों की इज्जत,मां-पिता की इच्छा जैसे कारणों से ‘प्यार’ को ही छोड देते है,गोया कि प्यार नही कोई कपडे की दुकान है जिसे अपनी पसंद और हैसियत देखकर चुना जाये।
                  पर प्रेम बरसों पुराना सच है, और हर दिल से फूटने वाला झरना भी ॥ दिलों का टूटना पूरे अस्तिस्व को ही तोड कर रख देता है।फ़िर से कहती हूं कि प्रेम गली अति संकरी है और फ़िसलन भरी भी,जहां अपनी सहूलियत से पैर रखने की स्वतंत्रता हर एक को है ;;फ़िर भी सभी जानकर खुशी-खुशी फ़िसलते है और ताउम्र टूटे दिल की यादों में डूबकर जीवन का आनंद ढूंढते हैं॥
बहरहाल जय हो प्रेम की!!! हैप्पी वैलेंटाईन डे………

Tuesday, 24 January 2012

“बाकी है………”

जो रात तुम्हारे साथ थी गुज़ारी
उस आख़िरी रात का,दर्द अभी बाकी है…
रह रह के मांगता है,मेरा दिल हिसाब मुझसे
सवालों और जवाबों का कुछ कर्ज़ अभी बाकी है…
जाने फ़िर कभी दोबारा बात हो ना हो
ज़िंदगी में फ़िर वो हसीन रात हो ना हो
फ़िर कभी मिलें ना मिलें,
थोडी दूर साथ चलें ना चलें,
तेरे सारे कशमकश जानता है प्यार है मेरा
फ़िर जाने कौन सा ‘नासूर’ हुआ मर्ज़ अभी बाकी है…
हर दुआ पर तुझे ही मांगना
अब आदत सी हो गई,
तेरी यादों में कब दिन ढला
जाने कब शाम रात सी हो गई,
अपनी हर ख़्वाहिश हर सांस से ज्यादा चाहा तुमको
फ़िर भी कुछ प्यास कुछ तडप मुझमें बाकी है
मालूम नही अदा करने को कौन सा फ़र्ज़ अभी बाकी है…।

प्यार है या नही????


                      प्यार है या नही????                                
कितना आसान होता है ना,किसी को कह देना कि मुझे तुमसे प्यार नही है॥पर सुनने वाला दिल ही जानता है कि उसने ज़िंदगी मे एक और हार देख ली। किसी का सहारा बन पाना इतना भी मुश्किल नही मगर हर किसी के लिए इस दिल को धडकाया भी तो नही जा सकता ना?लोग दिल के रिश्तों को लेकर कुछ ज्यादा ही ज़ज़्बाती हो जाते है,,गोया कि प्यार नही तो ये दुनिया ही बेमानी है। एक हद तक सच भी है कि प्यार बिना ज़िंदगी वैसी ही होती है जैसे बिना नमक के सब्ज़ी…जिसे निगला तो जा सकता है पर खाया नही जा सकता।
  प्यार की गलियां इतनी संकरी होती है कि उस पर दो लोग भी साथ नही चल सकते…अगर चलना भी चाहे तो एक को दूसरे की बांहों में समा जाना होगा। ऐसे में ‘तीसरे’ की गुंजाईश ही कहां रह जाती है??? फ़िर भी जिसे देखो प्यार करने का दम भरता नज़र आता है। आजकल प्यार करना चलन में है। पहले ये ‘हिमाकत’ कुछ दिलेर ही किया करते थे या यूं कहें कि प्यार तो सब करते आये है पर ज़माने को बताने की हिम्मत कुछ ही करते थे मगर अब तो जिसने प्यार का जायका नही लिया उसका तो जीवन ही व्यर्थ है,उसकी सोसायटी में कोई वैल्यू ही नही॥ वैसे प्यार कभी ‘’आऊट ऑफ़ फ़ैशन’’ नही हुआ पर आज का प्यार ज्यादा मुखर हो गया है।
एक लडका और लडकी हर सोशल साइट पर चीख चीखकर अपने प्यार,इज़हार और इन्कार की बातें करते है,,हमराज़ों की फ़ौज़ तैयार रहती है जो इस भाव पर दोस्ती निभाते है कि; तू मेरी हेल्प करना,मै तेरा काम बनाने में हेल्प करुंगा। दोस्तों को हर नये अफ़ेयर पर पार्टी दी जाती है और लेटेस्ट हद तो ये हो गई है कि “ब्रेक-अप” पार्टी भी दी जाती है,,मानो रिश्ता नही कोई पिंड छूटा हो जिसके लिए जश्न मनाया जाय॥
एक 16 साल की लडकी ने शरमाते हुए मुझे अपने मोहब्बत की दास्तान सुना डाली और दृढता से कहा कि वो लडके से बहुत प्यार करती है और उसके लिए कुछ भी कर सकती है। मैने यूं ही  उससे कह दिया कि, एक बार यही बात अपनी मम्मी के लिए भी कहो ज़रा…  इस अप्रत्याशित कथन पर  एकबारगी उसकी आंखों में पश्चाताप,गुस्सा,प्रेम और विवशता के भाव उभरे और वह मौन हो गई। मैने कहा 16 सालों में अपनी मां से प्यार नही कर सकी तुम, फ़िर दिल में अचानक इतना सारा प्यार उसके लिए कहां से उधार ले आई हो??
पता नही मैं उसको अपनी बात समझा सकी या नही पर एक बात जो मैने समझी है वो ये कि;;प्यार बहुत मजबूर कर देता है, हर अच्छे-बुरे से नज़र फ़ेरने को, ताकि सिर्फ़ प्यार किया जा सके। प्यार स्वार्थी भी बना देता है और बहुत मजबूत भी,,प्यार दुस्साहस भी देता है और सहारा भी॥ प्यार ज़ामाने की सारी खुशी है और जीवन भर सताने वाला ग़म भी॥ प्यार तो करना ही चाहिए और हर कोई करता भी है पर निभाने का दम हर किसी के बस की बात नही।  जो निबाह लेता है वो खामोश हो जाता है और खामोशी उसके प्यार की भाषा बन जाती है॥ तो ज़रुरी नही कि प्यार करे और ढिंढोरा पीटें,,इसे अकेले महसूस करने का मज़ा ही कुछ और है………

Saturday, 19 November 2011

i think....

एक प्रतिष्ठित मैगज़ीन  ने अपने वार्षिक सर्वेक्षण में 50 रसूखदार भारतीयों का नाम चयन किया है। इनमें अधिकतर उद्योगपति  है और उनके बाद अभिनेता, मीडिया पर्सन,खिलाडी और सामाजिक कार्यकर्ताओं  को स्थान प्राप्त हुआ है। इस सर्वेक्षण का आधार इन व्यक्तियों  की लोकप्रियता, कर्तव्यनिष्ठा , वैश्विक भागीदारी और करोडो की कमाई है। एक भी मध्यम या निम्न मध्यन वर्गीय व्यक्ति  इस सूची में शामिल नही है।कोई कलाकार, साहित्यकार या संगीतज्ञ  भी इस श्रेणी में सम्मिलित नही है। क्या उनका भारत-निर्माण में कोई योगदान नही है??
पत्रिका की चतुराई है कि उसने राजनीतिज्ञों  की सूची अलग से तैयार की है,,सम्मिलित सूची में कदाचित कोई राजनेता स्थान प्राप्त नही कर पाता और महिमामंड्न के आधुनिक काल में सत्तसीन राजनीतिकों ने सर्वत्र स्थान सुरक्षित किए है।इस तरह के एकतरफ़ा सर्वेक्षण और आत्मवाद का क्या अर्थ है,,मुझे समझ नही आता॥
आम जनता को सीधे तौर पर इस सूची निर्माण में शामिल नही किया जाता,,अवाम में ही सारी शक्तियां निहित होने के बावजूद वह स्वयं से अपरिचित है; और इसी अजनबीपन का परिणाम है ऐसे बेतुके और फ़िज़ूल सर्वेक्षण, जहां सिर्फ़ धनाढ्य वर्ग की पूजा की जाती है।यदि देश का प्रत्येक युवा “जागो इंडिया”
के विज्ञापन की तरह जाग गया तो नेता उसी तरह खामोश हो जाएंगे, जिसमें जागरुक युवा, प्रचार के लिए आए नेता से देश को चलाने के “जॉब” के लिए आवश्यक क्वालिफ़िकेशन पूछता है और नेता निरुत्तर हो जाता है।
जनता हर भ्रष्टाचार से , हर अन्याय  से उद्द्वेलित होती है परंतु प्रदर्शन का ठेका युवा पार्टियों ने ले रखा है जो महज़ पुतला जलाकर;; इस तरह के कल्याणकारी कार्यों में भी अपने स्वार्थ की संकरी गलियां ढूंढ लेती है। इसके अलावा छात्र पढाई में, कार्यकारी पैसे कमाने में, युवा इंटरनेट में और वृद्ध अपने इलाजों में व्यस्त है तो देश की सफ़ाई के लिए समय किसके पास है???
लोग कहते है सरकार को बदलना चाहिए, सरकार कहती है जनता में बदलाव की आवयश्कता है, दोनों मिलकर अधिकारी तंत्र को बदलना चाहते है पर खुद को बदलने की बात कोई नही करता। आज हम जिन सस्याओं से जूझ रहे हैं, उनका समाधान हम अपनी सोच के उस स्तर से नही कर सकते,, जिस स्तर पर हमने उन्हें उत्पन्न किया था। मगर देश तो सभी का है,,इसके लिए उसी तरह दर्द होना चाहिए जैसे अपने शरीर के लिए होता है।
फ़िलहाल पत्रिका ने रसूखदारों को खुश कर दिया है, हो सकता है उसे भी रसूख मिल जाए और मैं विज्ञापन की लाईने याद करके जागने का प्रयास कर रही हूं क्योकि “हर सुबह सिर्फ़ उठना नही जागना है”॥