Saturday 19 November 2011

i think....

एक प्रतिष्ठित मैगज़ीन  ने अपने वार्षिक सर्वेक्षण में 50 रसूखदार भारतीयों का नाम चयन किया है। इनमें अधिकतर उद्योगपति  है और उनके बाद अभिनेता, मीडिया पर्सन,खिलाडी और सामाजिक कार्यकर्ताओं  को स्थान प्राप्त हुआ है। इस सर्वेक्षण का आधार इन व्यक्तियों  की लोकप्रियता, कर्तव्यनिष्ठा , वैश्विक भागीदारी और करोडो की कमाई है। एक भी मध्यम या निम्न मध्यन वर्गीय व्यक्ति  इस सूची में शामिल नही है।कोई कलाकार, साहित्यकार या संगीतज्ञ  भी इस श्रेणी में सम्मिलित नही है। क्या उनका भारत-निर्माण में कोई योगदान नही है??
पत्रिका की चतुराई है कि उसने राजनीतिज्ञों  की सूची अलग से तैयार की है,,सम्मिलित सूची में कदाचित कोई राजनेता स्थान प्राप्त नही कर पाता और महिमामंड्न के आधुनिक काल में सत्तसीन राजनीतिकों ने सर्वत्र स्थान सुरक्षित किए है।इस तरह के एकतरफ़ा सर्वेक्षण और आत्मवाद का क्या अर्थ है,,मुझे समझ नही आता॥
आम जनता को सीधे तौर पर इस सूची निर्माण में शामिल नही किया जाता,,अवाम में ही सारी शक्तियां निहित होने के बावजूद वह स्वयं से अपरिचित है; और इसी अजनबीपन का परिणाम है ऐसे बेतुके और फ़िज़ूल सर्वेक्षण, जहां सिर्फ़ धनाढ्य वर्ग की पूजा की जाती है।यदि देश का प्रत्येक युवा “जागो इंडिया”
के विज्ञापन की तरह जाग गया तो नेता उसी तरह खामोश हो जाएंगे, जिसमें जागरुक युवा, प्रचार के लिए आए नेता से देश को चलाने के “जॉब” के लिए आवश्यक क्वालिफ़िकेशन पूछता है और नेता निरुत्तर हो जाता है।
जनता हर भ्रष्टाचार से , हर अन्याय  से उद्द्वेलित होती है परंतु प्रदर्शन का ठेका युवा पार्टियों ने ले रखा है जो महज़ पुतला जलाकर;; इस तरह के कल्याणकारी कार्यों में भी अपने स्वार्थ की संकरी गलियां ढूंढ लेती है। इसके अलावा छात्र पढाई में, कार्यकारी पैसे कमाने में, युवा इंटरनेट में और वृद्ध अपने इलाजों में व्यस्त है तो देश की सफ़ाई के लिए समय किसके पास है???
लोग कहते है सरकार को बदलना चाहिए, सरकार कहती है जनता में बदलाव की आवयश्कता है, दोनों मिलकर अधिकारी तंत्र को बदलना चाहते है पर खुद को बदलने की बात कोई नही करता। आज हम जिन सस्याओं से जूझ रहे हैं, उनका समाधान हम अपनी सोच के उस स्तर से नही कर सकते,, जिस स्तर पर हमने उन्हें उत्पन्न किया था। मगर देश तो सभी का है,,इसके लिए उसी तरह दर्द होना चाहिए जैसे अपने शरीर के लिए होता है।
फ़िलहाल पत्रिका ने रसूखदारों को खुश कर दिया है, हो सकता है उसे भी रसूख मिल जाए और मैं विज्ञापन की लाईने याद करके जागने का प्रयास कर रही हूं क्योकि “हर सुबह सिर्फ़ उठना नही जागना है”॥

Sunday 6 November 2011

happy diwali...


 दीवाली,दीवाली,दीवाली…जिस शोर के साथ ये त्यौहार आया था उसी के साथ चला भी गया। क्या कारण है कि यह महा-उत्सव बहुप्रतीक्षित होता है? वर्षारंभ में जब लोग पंचांग खरीदते है तो सबसे पहले यह देखते है कि दीवाली किस दिन है?? हास्यबोध  में ये भी कहा जाता है कि- दीवाली ने ‘दिवाला’ निकाल दिया है। क्योंकि अत्यंत आवश्यक जैसे- घर की सफ़ाई, लिपाई-पोताई,मरम्मत तथा अत्यंत अनावश्यक जैसे- पटाखों, पकवानों और वैभव प्रदर्शन में खर्च इसी समय किये जाते है। पर खर्च करने के बाद बखान करके रोने वाले ये भी बताएं कि- क्या उन्हें ये सब करने के लिए मां लक्ष्मी का फ़ोन आया था??
    कहने का अर्थ ये है कि, प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा और खुशी से व्यय करता है तो फ़िर रोना किस बात का?? क्या भगवान कहते है कि एशियन पेन्ट्स से घर रंगवाओ,नई कार खरीदो, 10000/- के पटाखे फ़ूंक डालो और बिला वजह सारे घर के चादर और पर्दे बदल डालो। और सर्वाधिक रोना रोती है स्त्रियां जो धनतेरस और पुष्य नक्षत्र में ‘कुछ ना कुछ’ खरीदना अपना परम कर्तव्य समझती है।
महंगाई और खर्चों को कोसने वाले भी शायद भूल जाते है कि ये व्यय निरर्थक है यदि आपके आस-पास  कोई भी ऐसा है जो दुखी है,,और जिसकी खुशी आपके सामर्थ्य में है। यदि पडोस का कोई बच्चा पकवानों का स्वाद नही जानता और पटाखो को अरमानों से ताकता है तो हम कभी तृप्त नही हो सकते और यदि किसी गरीब के पास एक दिया जलाने को भी तेल नही तो विश्वास करिए कि लक्ष्मी कभी आप के घर रुकना नही चाहेगी,चाहे आप घी के दिए की कतारें लगा लें।
इस त्यौहार को मनाने के कारण शायद भिन्न रहे होंगे। पांच दिवसीय यह उत्सव हर दिन एक अलग उत्साह सजाता है। पर सबके लिए इस त्यौहार में खुश होने के कारण बदल गए है। बच्चे मिठाई और पटाखों के दीवाने होते है।सरकारी कामगरों को लंबी छुट्टी सुहाती है और व्यापारियों को तो साल में ये दिन सबसे अधिक प्रिय होते है। किसी ने कोई महंगी वस्तु खरीदी है और कोई इन छुट्टीयो में अपने घर वापस जा रहा है,इसलिए खुश है।
कारण चाहे जो भी हो; यह त्यौहार अत्यंत लोकप्रिय है क्योकि सुंदरता,वैभव,उत्साह और पूजा पाठ में इसका मुकाबला और किसी उत्सव से नही किया जा सकता है। धन की देवी को लोग  धन व्यय से आकर्षित कर हर्षित होते है। हमें इसके वास्तविक उद्देश्यों  को याद कर उत्साह के घोडे की लगाम को खींचना चाहिए और खर्च के खेत पर ना छोडकर किसी शांत  और स्वच्छ  मैदान पर यूं ही छोड देना चाहिए।
बहरहाल “शुभ-दीपावली”॥