Friday, 26 August, 2011

best relationshp in the world........

the best poetry i ever read...dedicated to my "maa"



                                       मां के घर बिटिया जन्मे…बिटिया के घर मां…
बुने हुए स्वेटर में, मां ने भेजा है पैगाम,
देहरी आंगन द्वार बुलाते,कब आएगी अपने गांव??
अरसा बीता ब्याह हुए,क्या अब भी आती मेरी याद,
कैसी है तू?? धडक रहा मन,लौटी ना बरसों के बाद।
मोर, कबूतर अब भी छत पर,दाना चुगने आते है,
बरसाती काले बादल,तेरा पता पूछकर जाते है।
रात की रानी की खुश्बू में,तेरी महक समाई है,
हवा चले तो यूं लगता है,जैसे बिटिया आई है।
आज भी ताज़ा लगते है,हल्दी के थापे हाथों के,
एक-एक पल याद मुझे बचपन की बातों के॥

सीवन टूटी जब कपडों की,या उधडी जब तुरपाई,
कभी जला जब हाथ तवे पर,अम्मा तेरी याद आई।
छोटी छोटी लोई से मै,सूरज चांद बनाती थी,
जली-कटी उस रोटी को तू,बडे चाव से खाती थी।
जोधपुरी बंधेज सी रोटी,हाथ पिसा मोटा आटा,
झूमर था भाई- बहन का,कौर कौर हमने बाँटा ।
गोल झील सी गहरी रोटी,उसमे घी का दर्पण था,
अन्न्पूर्णा आधी भूखी, सब कुटुम्ब को अर्पण था।
अब समझी मैं ,भरवां सब्जी,आखिर में क्यो तरल हुई??
जान लिया है मां बनकर ही,औरत इतनी सरल हुई।
ज्ञान हुआ खूंटे की बछिया,क्यो हर शाम रम्भाती थी,
गैया के थन दूध छलकता,जब जंगल  से आती थी।
मेरे रोशनदान में भी अब, चिडिया अंडे देती है,
खाना-पीना छोड उन्हे फ़िर,बडे प्यार से सेती है।
गाय नही पर भूरी कुतिया,बच्चे देनेवाली है,
शहर की इन सूनी गलियों में, रौनक छानेवाली है।

मेरे ही अतीत की छाया,इक सुंदर सी बेटी है,
कन्धे तक तो आ पहुची, मुझसे थोडी छोटी है।
यूं भोली है लेकिन थोडी,जिद्दी है मेरे जैसी ,
चाहा मैने न बन पाई,मै खुद भी तेरे जैसी।
अम्मा तेरी मुनिया के भी,पकने लगे रेशमी बाल,
बडे प्यार से तेल रमाकर,तूने की थी सार-संभाल्।
जब से गुडिया मुझे छोड, परदेस गई है पढने को,
उस कुम्हार सी हुई निठ्ठ्ली,नही बचा कुछ गढने को।

तूने तो मां बीस बरस के, बाद मुझे भेजा ससुराल,
नन्ही बच्ची देस पराया,किसे सुनाऊं दिल का हाल्।
तेरी ममता की गर्मी,अब भी हर रात रुलाती है,
बेटी की जब हूक उठे तो,याद तुम्हारी आती है।
जनम दोबारा तेरी कोख से,तुझसा ही जीवन पाऊं
बेटी हो हर बार मेरी फ़िर उसमें खुद को दोहराऊं॥

Monday, 22 August, 2011

THATS LOV

ठंडी  रातों में जागती आंखों में
जब आदतन मुझे खोजता होगा
भर के तकिया अपनी बांहों में
धीरे से आंसू पोंछता होगा।

हर साये पर चौककर वो
मेरे अहसास बुझाता होगा
मेरी बांहों के सिरहाने को तरसता
मेरी यादों  में खो जाता होगा।

मेरे ही सपने खुली आंखों  से
अश्क बन कर ढलकते होंगे
दिल में हर रात मुझसे मिलने के
कितने ज़ज़्बात सुलगते होंगे।

कितनी बार अपने दिल को समझाकर
उसने दिनरात गुजारे होंगे
कितनी अधूरी तम्मनाओं के सिलसिलें
मेरे ही वज़ूद के सहारे होंगे।

मुझे पाकर खो देने का
उसे आज भी ग़म होता होगा
भीड में भी तन्हा, उदास
मेरे ख्यालों में वो खोता होगा।
मुझे पाने की उम्मीद पर
पल-पल वो रोज़ रोया होगा
मुझको है जब नींद नहीं आती
कैसे मानूं कि वो सोया होगा॥

Saturday, 20 August, 2011

I LOV MY PRINCESS...

मोनिशा सेन नामक एक मोहतरमा का बेहद प्यार भरा और भावुकतापूर्ण लेख पढा,जिसमें उन्होनें अपनी छोटी सी बिटिया का बचपना और अठखेलियों का वर्णन  अत्यंत साधारण और सरल शब्दों में किया था। और लेख का अंतिम वाक्य था कि-“ मेरी प्यारी बेटी तुम छोटी ही रहो और जल्दी –जल्दी बडी मत बनो वरना मुझे तुम्हारे सहारे जीना छोड्ना पडेगा” ॥
    जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों के माध्य्म से अपना बचपन जीते हैं, उसी तरह माएं अपनी बेटियों को अपना बचपन और यौवन समझतीं हैं।पुत्र पर पिता का नियंत्रण युवावस्था आते तक शिथिल हो जाता है;जबकि बेटी की युवावस्था में माताओं को ना चाहकर भी कठोर और अव्यवहारिक अनुशासन रखना पडता है। बचपन में बाप की गोद में तुतलानें और ईठलाने वाली उनकी ‘गुडिया’,,जवानी की दहलीज़ पर ही उनसे अनावश्यक दूर हो जाती है।पिता स्वंय एक अनकहा अंतराल रखने लगते है और घर बाहर की बडी महिलाएं उनको इस तरह पोषित करती हैं मानो वह बडी होकर कोई अपराध कर रही है।इसलिए समान परवरिश प्राप्त करने पर भी लडकियां, लड्कों की तुलना में शीघ्र परिपक्व हो जाती है।
बेटियां मां के संरक्षण में बडी होती है इसलिए हर बेटी अपनी मां की प्रतिकृति होती है।बेटों के माध्यम से माता-पिता अपने सपनों और अरमानों को पूरा करते है और बेटियां उनका सम्मान होती है जो हर उम्र और हर दुख में उनके साथ खडी रहती है।
“जब वी मेट” में एक सम्वाद का दुहराव हास्य उत्पन्न करने के लिए किया गया है कि,,जवान लड्की खुली तिजोरी की तरह होती है॥ जबकि ज़माना इस क़दर असुरक्षित है कि जिसने अपने भय पर विजय नही पाई और आत्मविश्वास ख़ो दिया,वह लुटेगा ही। और यह लूट लिंगभेद नही करती। कहने का मतलब ये है कि सभी खुली तिजोरी बन चुके है।
    बेटियों की भूमिका और स्थान बदल चुके है,,फ़िर भी जो एक चीज़ नही बदली है वो है बेटियों का प्यार भरा ‘दिल’; आज वो हर मां का दिल और बाप की नाक सम्भाल रही है॥टीवी पर बेटियों पर आधारित सीरियलों की बाढ आई है और वे माताओं की कमज़ोर नस को छू रहें है।जिस प्रकार हर सास,बहू का प्रगतिवादी रुप है,उसी तरह हर बेटी मां बनकर ही मां-बेटी के खूबसूरत रिश्तें को समझ पाती है।मेरा ये लेख बेटीयों के माता पिता को ज़रुर पसंद आएगा,,क्योंकि ये मेरे भी दिल के क़रीब है॥हर बेटी के मां –बाप की यही पीडा होती है शायद—
“जब बिटिया आई थी घर में,आंखों से खुशियां छलकी थी
भूल गए थे एकदिन दिल से,इस हिस्से को जुदा होना भी है”

Thursday, 18 August, 2011

"बूद्धूबक्सा"

“ज़िंदगी मिलेगी ना दोबारा” यही नाम है उस नई फ़िल्म का, जिसमें  एक दृशय में तीन मित्र फ़ुरसत के पलों में पुराना दौर याद करते है और दूरदर्शन की प्रारंभिक सकेत ध्वनि का मख़ौल  उडाते है॥मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये पसंद नही आया;क्योकि दूरदर्शन और आकाशवाणी कोई मज़ाक की विषयवस्तु नही अपितु राष्ट्रीय दस्तावेज की तरह है॥हमारे लोकगीत –संगीत,परम्परा और सांस्कृतिक  धरोहरों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आज भी यही निभा रहें है,,और ये बात उतनी ही सच है,जितने कि दिन और रात का होना॥
सभी को वो पुरानी बाते याद ही होंगी,,जब हम दूरदर्शन पर प्रसारित कृषि-दर्शन को भी बडे चाव से देखते थे। हफ़्ते भर के इंतज़ार के बाद सप्ताह मे एक दिन(जो बाद मे दो दिन आने लगा),फ़िल्मी गीतों का आधे घंटे का बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘चित्रहार’ आता था,जिसके लिए मां और दीदीयां अपना काम जल्दी खत्म कर लेती थीं,शायद ही कोई इसे देखना छोडता होगा। आज टीवी पर कितने ही म्यूज़िक चैनल है परंतु लोगों के पास ना समय है ना रुचि।
   20 सालों में मैनें स्वयम दुनिया को बदलते देख लिया है; पहले आने वाले ‘धारावाहिक’ अब ‘डेली सोप’ बन चुके हैं। मै उस दौर की बात कर रही थी ,जब आदर्शों और साहित्यिक चरित्रों पर आधारित स्वच्छ छवि के धारावाहिक लोग रुचि के साथ देखते थे। प्राइवेट चैनल्स की बाढ दूरदर्शन की इस सफ़ाई और आदर्शवाद  को अपने साथ बहाकर ले गई है।कहते है ना,,कि हमेशा खुश रहने के लिए ;हमेशा सही होना भी ठीक नही होता। तो आज का नज़ारा ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग दूरदर्शन  की अपेक्षा नंग-धडंग चैनल्स देखना पसंद करते है।
इस लेख को पढने वालों को ये सब पढ्कर अच्छा लग रहा होगा और खुद लिखने वाली मुझको भी केवल लिख कर ही भडास निकालनी है, देखना तो वही ‘एम-टीवी’ या ‘ज़ी’ ही है। क्योकि किसी को कोई रुचि नही रही,सामाजिक सरोकार के धारावाहिक बनाने में या देखने में। और जो लोग पसंद कर रहे है,उसी को दिखाने के चक्कर में,दूरदर्शन भी अपनी स्वाभाविकता और देसीपन खो बैठा। फूहडता की आंधी में ये बूद्धूबक्सा भी अन्य चैनलों से होड करने की फ़िराक में वाहियात पन पर उतर गया; और अब जब लोग पुन: भली चीज़ें देखना चाह रहे हैं तो उनके पास कोई विकल्प नही है,सिवाय धार्मिक चैनल्स के जिसमे आधे समय ‘कवच’,रुद्राक्ष, या यंत्र बेचे जाते है।या फ़िर ‘योग’, प्राणायाम और ज्योतिष दिखाया जाता है।
    बहरहाल मै उस दौर को शिद्द्त से ‘मिस’ करती हूं और चाहती हूं कि दूरदर्शन फ़िर से वापसी करे॥इस बार लोग उसका इन्तज़ार कर रहें है,,क्योकि सभी को अपना बीता हुआ हसीन कल आजीवन लुभाता है॥ आइए सिर्फ़ इतना करें कि सार्थक और अच्छी चीज़ें देखे,,ताकि सामाजिक भला भी हो।

Wednesday, 17 August, 2011

तेरी आंखें……।

चेहरा है चांद जैसा और
सितारें है तेरी आंखे
पतझड के मौसम में जैसे
बहारें है तेरी आंखे…

गुल की पंखुडी पर जैसे
शबनम है तेरी आंखे
कभी पथराई सी खामोश
और कभी सरगम है तेरी आंखें…

रुह के हर कोने तक
पहुंचे जो पैग़ाम है तेरी आंखें
अनजाना एक खूबसूरत सा
सलाम है तेरी आंखें…

सावन में तेरी याद में
तरसती है मेरी आंखें
और काले बादल सी इठलाकर
बरसती है तेरी आंखें…

कुछ ना कहकर भी सबकुछ
कह जाती है तेरी आंखें
दिल को एक भीगा सा
अहसास दे जाती है तेरी आंखें…

थम जाती हैं,धडकनें सबकी
जब झुक जाती है तेरी आंखें
जाने किसको खोजकर;यूं
रुक जाती है तेरी आंखें…

भर नज़र देख ले
एक बार अगर तेरी आंखें
बंद सांसों को ज़िंदा
करती है,उठकर तेरी आंखें…

खुशनसीब है वो जिसे
प्यार से निहारें तेरी आंखें
इस तकदीर की भी हसरत है
कि उसे सवांरें तेरी आंखें
सवांरें तेरी आंखें॥

Tuesday, 16 August, 2011

AASTHA...

एक व्यक्ति ने लाखो रुपए खर्च करके एक मंदिर के सामने ज़मीन खरीदी और बीयर बार बनाने की मंशा रखते हुए,निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। जैसा कि सदैव होता है,मंदिर के अनुयायी और सम्भ्रान्त नागरिक इस तथाकथित पाप को रोकने के लिए सभाएं,धरने,जागरण एवम प्रार्थनाएं करने लगे। विशेष सामूहिक पूजा-अर्चना आयोजित की गई ; जिसमें सभी ने एक साथ यह दुआ की; कि “बार” ध्वस्त  हो जाए या नष्ट हो जाये।
       तमाम विरोधों के बाद भी बार बनकर तैयार हो गया और ठीक उसके उद्घाटन समारोह में दुर्भाग्य पूर्ण तरीके से वह मज़बूत बार की इमारत स्वतः गिरकर ध्वस्त हो गई। विरोधी अपनी जीत पर प्रसन्न हो गए।अब आया कहानी में ट्विस्ट,,बार स्वामी ने न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर दी कि- बार के ध्वस्त होने का कारण उन लोगों की प्रार्थना है,जो उन्होनें सामूहिक तौर पर की थी; क्योंकि अन्य कोई कारण दृश्य नहीं है, अतः उन सभी को दंड दिया जाए।
   अब अनुयायियों के घबराने का अवसर था,,अतः उन्होनें भी गुहार लगाई कि-यह बार उनकी पूजा-प्रार्थना के कारण ध्वस्त नहीं हुआ है। जज निर्णय नही ले पा रहे है,क्योकि एक तरफ़ वो है जो ईश्वर पर विश्वास कर रहा है।और दूसरी तरफ़ उन लोगों की भीड है,जो रोज़ मंदिर जाते है,पूजा करते है; मगर ईश्वर की शक्ति पर उन्हें भरोसा नही।
   कितनी आश्चर्यजनक कथा है ना?? परंतु यथार्थ के बेहद निकट है। भगवान का दिनरात नाम रटने वाले ही सर्वाधिक असुरक्षित,स्वार्थी,लोभी एवम दुराचारी होते है। इसके विपरीत अंतर्मन में ईश्वर को बसाने वाले दिखावा नही करते। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ क अंतिम दृश्य पूरे फ़िल्म की आत्मा है,,जिसमें अपराधी सरगना ज्योतिषी की कनपटी पर पिस्तौल टिकाकर उससे उसका भाग्य पूछ्ता है। और ज्योतिषी अपने होश खो बैठता है। इसके बाद मुन्ना भाइ सबसे कहते हैं कि- “ ये दुनिया में साला कोई सच बोलता है तो लोग उसकी वाट लगा देते है”,,इसके मायने है कि यदि हम गांधी के आदर्शों  और सिद्धांतों को अपना नही सकते तो हम उनको “राष्ट्र्पिता” क्यों कहते है?? क्यों  महात्मा कहकर सडकों और दिवसों के बहाने उनको याद करते है? यदि उन्हें वास्तविक सम्मान देना है तो,सत्य और अहिंसा को स्वीकार करना ही होगा।
   ईश्वर की रची दुनिया में लोग ईश्वर का सहारा केवल परलोक सुधारने के लिए लेते है या पाप छिपाने के लिए॥इसके अलावा और कोई कारण मुझे तो समझ नही आ रहा है॥रही बात मन की शांति की,तो वो मन में ही मिलेगी,,मंदिर में नही !!!!!

Monday, 15 August, 2011

ये है देश की धडकन॥

फ़ुरसत आज कल नसीब वालों को मिलती है,,कल मेरा भी भाग्य जाग गया था;आज फ़िर सो गया।और ये फ़ुरसत मिली भी तो कहाँ ट्रेन में……।रेलगाडी की अपनी अलग ही दुनिया है ना !!देश में कुछ भी हो जाए,पर रेलें हडताल पे नही जाती॥क्योकि वही ज़िन्दगी की रफ़्तार भी सम्भालती हैं॥ मुझे तो ये चलता फ़िरता भारत लगती हैं,,सच भी है; हर स्टेशन पे बदलते चेहरे, सबके अलग अंदाज़,अपनी अपनी कहानी,अलग परिवेश, अलग भाषा और अलग ही दुनिया;फ़िर भी हमसफ़र बन जाते है।कुछ की मंज़िलें भी एक ही होती है लेकिन फ़िर राहें जुदा –जुदा। बडी ही मज़ेदार और अनोखी होती है ये पटरी वाली दुनिया…॥
        आप चाहे लाख सुविधाएं जुटा लिजिए,,हवाई यात्रा और ट्रेन की एसी का बडा “अनबोला” सा व्यवहार ,सामान्य और दूसरे दर्जे का मुकाबला नही कर सकता॥ सबकी जेब में इतने पैसे तो होते ही हैं कि, वो एक अदद अख़बार खरीद कर पढ सके,मगर नही; एक ही अख़बार के अलग अलग पन्ने विभिन्न्न हाथों में होते है।ये महज़ एक तरीका होता है,सामने वाले अपरिचित से बात शुरु करने का॥ कोई ज्वलंत मुद्दा हो तो फ़िर बयान,व्याख्यान और बहस इस तरह होती है,मानो जीतने वाले को कोई पुरस्कार मिल जाएगा।बहस में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने सम्पूर्ण  ज्ञान का प्रदर्शन  करना चाहता है॥मूंगफली खाते हुए लोग,घर से लाए खाने की  अलग अलग खुश्बू,पानी की बोतलें।बहुत सारी जिज्ञासु और कुछ शरारती आंखें……ये नज़ारा होता है, स्लीपर कोच का।पहचान बढाने के लिए सामने वाले के बच्चे को प्यार करना शुरु करते है लोग,और फ़िर शुरु होता हैबातचीत और रिशतों का नया सिलसिला।पहचान बढकर आत्मीयता में बदल जाती हैऔर,,’भाईसाहब आप भी एक परांठा लिजिए ना” पर खत्म होती है॥ भाईसाहब भी कृतज्ञता का निर्वहन करते है कि॥“ज़रुर लूंगा,पहले आप ये दाल मोठ लें,घर के बने है जी”॥
   मैनें कुछ पत्रिकाओं में पढा है (वो जिनमे लोग अपने अनुभव बताते है ना) कि,लोगों को ट्रेन में प्यार भी हुआ है।एक फ़िल्म में देखा था;हीरो ,हीरोईन को बचाता है,फ़िर उन दोनो में कुछ कुछ हो जाता है। मै ऐसे किन्ही लोगो को नही जानती जिनके साथ ऐसा हुआ हो,,मगर मेरी बहुत सी सहेलियों को ट्रेन में ज़बरदस्त छेडछाड का भयानक अनुभव हुआ है॥पता नही,लोग कैसे ताकाझांकी,इशारेबाजी इन सबको भी टाईमपास बनाकर सफ़र काट लेते है,,वो भूल जाते है कि उनके घर की स्त्रियों को भी यही सब सहना है॥
बहरहाल कहना यही है कि, भारत का सबसे बडा रोजगार देने वाला ये साधन देश की गति के समानांतर बहने वाली धारा है;जिसमें देश के प्राण बसते है।मुझे बचपन कि वो लडाई याद है,जिसमे मै और मेरा भाई,खिडकी के पास वाली सीट पे इसलिए बैठा करते थे ताकि  पेडों को तेजी से भागते हुए और पटरियों को हिलते हुए देख सके,,साथ में प्लेटफॉर्म  के मज़ेदार नज़ारे और खाने की चीजों पर बराबर ध्यान रहने की सुविधा  मिलती थी वो भी मुफ़्त मुफ़्त मुफ़्त॥ और मुझे नही लगता इन सबका आकर्षण कभी खत्म होता है।
आज लोग भले ही फ़्लाईट्स में आसमान छू रहे हैं मगर भारत दर्शन तो ट्रेनों में ही सम्भव है …।

Thursday, 11 August, 2011

मेरी पसंद की कविता…"डॉ हरिवंशराय बच्चनजी " के कलम से

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में
,क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

Tuesday, 9 August, 2011

अजीब है दिल के दर्द्……

"अजीब है दिल के दर्द यारों,
ना हो तो मुश्किल है जीना इसका,
जो हो तो हर दर्द एक हीरा,
हर एक ग़म है नगीना इसका"
                     कितनी हसीन लाईनें है ना????? ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को बेहतर बयान करती है।बिना ग़म के जीने का क्या अर्थ और बगैर संघर्ष  के कैसा जीवन???कुछ लोग हमेशा रोते रहते हैं,,ये कहकर कि उनकी ज़िन्दगी मे बहुत दुख है,,मुझे लगता है ईश्वर कुछ खास लोगों को चुन लेते है;परीक्षा लेने के लिए,शायद उसे उन लोगों पर ज्यादा भरोसा होता है कि ये ज़रुर पास हो जाएंगे। और हममें से कुछ ये भी सोचते है कि, किसी-किसी को सब कुछ आसानी से प्राप्त है;मगर आसान कुछ भी नही होता………………………
               जिसके पास धन है,उसके पास सुकून नही। जिसके पास धन और सुकून दोनो है,उसके पास ये सुख भोगने के लिए आयु नही। और जिसके पास आयु भी है,उसके पास "प्रेम" नही॥और प्रेम के बिना तो स्वर्ग का सुख भी निरर्थक है…… गोया कि सबके हिस्से में अलग-अलग अभाव,उपलब्धियाँ ,कमियां और सुविधाएं  ऊपरवाले ने लिखी है; और हर हाल में खुश रहने के  सिर्फ़ 2 ही तरीके होते है-- या तो जो हासिल है,उसके साथ खुश रहना सीख लो,,या फ़िर जो मिला नही,उसके बिना खुश रहने की आदत डाल लो॥
          वास्तविक पुरषार्थी तो वही है जिसने भीषण दुख में भी अपने आंसू स्वंय भी नही देखे और ना ही किसी को दिखाए,क्योकि मुस्कराहटें  उसकी शक्ति ही नही,उसका जीवन-स्रोत बन जाती हैं॥

Monday, 8 August, 2011

अपनी मिट्टी…।

आज सुबह मंदिर जान हुआ,जैसे सावन के हर सोमवार पे बहुत से लोग जाया करते हैं। बाद मे भगवान के लिए समय मिले ना मिले ये सोचकर बडे सारे लोग सुबह ही इसे काम समझकर निपटाने पहुंच जाते है,मेरी तरह्॥इसिलिए मंदिर मे काफ़ी भीड थी आज। हमेशा की तरह पूजा सामग्री खरीद रही थी,तभी एक पुरुष स्वर कानो मे पडा,,"आज शिवरात्रि है क्या??" मैनें ये प्रश्न पूछने वाले की तरफ़ पलटकर देखा। मुझे उत्सुकता हुई कि ये विचित्र प्रश्न करने वाला है कौन?? भारत में तो मुसलमान और ईसाई भी जानते है कि शिवरात्रि इस समय नही होती;फिर ये जानते नहीं या फिर अनजान होने का नाटक कर रहे हैं???
       मैनें सरसरी निगाह से उसे देखा,,वो अंग्रेजों की तरह दिखने वाला एक भारतीय ही था॥ उसे फूल बेचने वाले बच्चों ने बताय कि आज सावन का आखरी सोमवार है,इसलिए सभी पूजा करने आए हैं।फिर उसने अगला प्रश्न मुझसे किया,"क्या आपके ५ रु से शिव जी खुश हो जाएंगे???"
मैनें जवाब देना अपना कर्तव्य समझा,और कहा- आप प्रणाम  भी कर लेंगे तो वे खुश हो जाएंगे,मगर यदि आपने फूल ले लिए तो ये बच्चे ज़रुर खुश होन्गे और शिव जी को खुश होने से कोई नही रोक पाएगा। वो मेरे जवाब से संतुष्ट लगा,,मुझे जल्दी थी तो मै बिना रुके मन्दिर के अंदर चली गई।
           मेरे पूजा करने के समय मैनें देखा कि वो भी फूल लेकर चला आया,और मुझसे पूछ पूछ कर उसने पूजा सम्पन्न की। मैं प्रसाद लेकर जाने के लिए चली ही थी कि महाशय फ़िर मेरे सामने थे;और लोग वहां उम्रदराज़ थे,तो शायद उसे बात करने को मैं ही मिली थी। उसने खुद ही बताना शुरु किया कि वो काफ़ि सालों तक देश से बाहर रहा है,और अभी अभी यहां लौटा है।
           उसने कहा- हम अमेरिका में इस तरह पूजा नहीं करते।बल्कि ध्यान लगाकर आराधना करते है,,उसे यहां का तरीका बहुत अजीब लगा कि;किस तरह हम पानी,अगरबत्ती,धूप,दीप,नारियल,से भगवान को 'परेशान' करते है।मैने उसे बताया कि यही फ़र्क है देस और परदेस में,,हमारे लिए ये आडम्बर ही पूजा है और हमारा भग्वान इसे ही पसन्द भी करता है। आप वहा ऐसा इसलिए करते है क्योकि वो देश आपको इतनी भी आज़ादी नही देता कि आप अपनी ईच्छा अनुसार पूजा भी कर सकें
फ़िर मै उनसे बिदा लेकर चल पडी,,ड्राइव करते समय यही सोच रही थी कि,क्या सुख है विदेशों मे??फ़िर भी हर कोई चाहता है कि उसक बच्चा पढ लिख कर विदेश जाए…क्यो???? यही करने के लिए और अपने देश और मिट्टी से दूर होने के लिए॥
      हर जाने वाले के लिए वापसी का रास्ता ज़रुर होना चहिए ताकी वो वतन से ताउम्र जुडा रहे।