Saturday 19 November 2011

i think....

एक प्रतिष्ठित मैगज़ीन  ने अपने वार्षिक सर्वेक्षण में 50 रसूखदार भारतीयों का नाम चयन किया है। इनमें अधिकतर उद्योगपति  है और उनके बाद अभिनेता, मीडिया पर्सन,खिलाडी और सामाजिक कार्यकर्ताओं  को स्थान प्राप्त हुआ है। इस सर्वेक्षण का आधार इन व्यक्तियों  की लोकप्रियता, कर्तव्यनिष्ठा , वैश्विक भागीदारी और करोडो की कमाई है। एक भी मध्यम या निम्न मध्यन वर्गीय व्यक्ति  इस सूची में शामिल नही है।कोई कलाकार, साहित्यकार या संगीतज्ञ  भी इस श्रेणी में सम्मिलित नही है। क्या उनका भारत-निर्माण में कोई योगदान नही है??
पत्रिका की चतुराई है कि उसने राजनीतिज्ञों  की सूची अलग से तैयार की है,,सम्मिलित सूची में कदाचित कोई राजनेता स्थान प्राप्त नही कर पाता और महिमामंड्न के आधुनिक काल में सत्तसीन राजनीतिकों ने सर्वत्र स्थान सुरक्षित किए है।इस तरह के एकतरफ़ा सर्वेक्षण और आत्मवाद का क्या अर्थ है,,मुझे समझ नही आता॥
आम जनता को सीधे तौर पर इस सूची निर्माण में शामिल नही किया जाता,,अवाम में ही सारी शक्तियां निहित होने के बावजूद वह स्वयं से अपरिचित है; और इसी अजनबीपन का परिणाम है ऐसे बेतुके और फ़िज़ूल सर्वेक्षण, जहां सिर्फ़ धनाढ्य वर्ग की पूजा की जाती है।यदि देश का प्रत्येक युवा “जागो इंडिया”
के विज्ञापन की तरह जाग गया तो नेता उसी तरह खामोश हो जाएंगे, जिसमें जागरुक युवा, प्रचार के लिए आए नेता से देश को चलाने के “जॉब” के लिए आवश्यक क्वालिफ़िकेशन पूछता है और नेता निरुत्तर हो जाता है।
जनता हर भ्रष्टाचार से , हर अन्याय  से उद्द्वेलित होती है परंतु प्रदर्शन का ठेका युवा पार्टियों ने ले रखा है जो महज़ पुतला जलाकर;; इस तरह के कल्याणकारी कार्यों में भी अपने स्वार्थ की संकरी गलियां ढूंढ लेती है। इसके अलावा छात्र पढाई में, कार्यकारी पैसे कमाने में, युवा इंटरनेट में और वृद्ध अपने इलाजों में व्यस्त है तो देश की सफ़ाई के लिए समय किसके पास है???
लोग कहते है सरकार को बदलना चाहिए, सरकार कहती है जनता में बदलाव की आवयश्कता है, दोनों मिलकर अधिकारी तंत्र को बदलना चाहते है पर खुद को बदलने की बात कोई नही करता। आज हम जिन सस्याओं से जूझ रहे हैं, उनका समाधान हम अपनी सोच के उस स्तर से नही कर सकते,, जिस स्तर पर हमने उन्हें उत्पन्न किया था। मगर देश तो सभी का है,,इसके लिए उसी तरह दर्द होना चाहिए जैसे अपने शरीर के लिए होता है।
फ़िलहाल पत्रिका ने रसूखदारों को खुश कर दिया है, हो सकता है उसे भी रसूख मिल जाए और मैं विज्ञापन की लाईने याद करके जागने का प्रयास कर रही हूं क्योकि “हर सुबह सिर्फ़ उठना नही जागना है”॥

Sunday 6 November 2011

happy diwali...


 दीवाली,दीवाली,दीवाली…जिस शोर के साथ ये त्यौहार आया था उसी के साथ चला भी गया। क्या कारण है कि यह महा-उत्सव बहुप्रतीक्षित होता है? वर्षारंभ में जब लोग पंचांग खरीदते है तो सबसे पहले यह देखते है कि दीवाली किस दिन है?? हास्यबोध  में ये भी कहा जाता है कि- दीवाली ने ‘दिवाला’ निकाल दिया है। क्योंकि अत्यंत आवश्यक जैसे- घर की सफ़ाई, लिपाई-पोताई,मरम्मत तथा अत्यंत अनावश्यक जैसे- पटाखों, पकवानों और वैभव प्रदर्शन में खर्च इसी समय किये जाते है। पर खर्च करने के बाद बखान करके रोने वाले ये भी बताएं कि- क्या उन्हें ये सब करने के लिए मां लक्ष्मी का फ़ोन आया था??
    कहने का अर्थ ये है कि, प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छा और खुशी से व्यय करता है तो फ़िर रोना किस बात का?? क्या भगवान कहते है कि एशियन पेन्ट्स से घर रंगवाओ,नई कार खरीदो, 10000/- के पटाखे फ़ूंक डालो और बिला वजह सारे घर के चादर और पर्दे बदल डालो। और सर्वाधिक रोना रोती है स्त्रियां जो धनतेरस और पुष्य नक्षत्र में ‘कुछ ना कुछ’ खरीदना अपना परम कर्तव्य समझती है।
महंगाई और खर्चों को कोसने वाले भी शायद भूल जाते है कि ये व्यय निरर्थक है यदि आपके आस-पास  कोई भी ऐसा है जो दुखी है,,और जिसकी खुशी आपके सामर्थ्य में है। यदि पडोस का कोई बच्चा पकवानों का स्वाद नही जानता और पटाखो को अरमानों से ताकता है तो हम कभी तृप्त नही हो सकते और यदि किसी गरीब के पास एक दिया जलाने को भी तेल नही तो विश्वास करिए कि लक्ष्मी कभी आप के घर रुकना नही चाहेगी,चाहे आप घी के दिए की कतारें लगा लें।
इस त्यौहार को मनाने के कारण शायद भिन्न रहे होंगे। पांच दिवसीय यह उत्सव हर दिन एक अलग उत्साह सजाता है। पर सबके लिए इस त्यौहार में खुश होने के कारण बदल गए है। बच्चे मिठाई और पटाखों के दीवाने होते है।सरकारी कामगरों को लंबी छुट्टी सुहाती है और व्यापारियों को तो साल में ये दिन सबसे अधिक प्रिय होते है। किसी ने कोई महंगी वस्तु खरीदी है और कोई इन छुट्टीयो में अपने घर वापस जा रहा है,इसलिए खुश है।
कारण चाहे जो भी हो; यह त्यौहार अत्यंत लोकप्रिय है क्योकि सुंदरता,वैभव,उत्साह और पूजा पाठ में इसका मुकाबला और किसी उत्सव से नही किया जा सकता है। धन की देवी को लोग  धन व्यय से आकर्षित कर हर्षित होते है। हमें इसके वास्तविक उद्देश्यों  को याद कर उत्साह के घोडे की लगाम को खींचना चाहिए और खर्च के खेत पर ना छोडकर किसी शांत  और स्वच्छ  मैदान पर यूं ही छोड देना चाहिए।
बहरहाल “शुभ-दीपावली”॥

Tuesday 25 October 2011

22.10.2011

22/10/2011 की वो शाम बिलासपुर के पन्नो पर दर्दनाक हादसा बनकर दर्ज हुई और कुछ दिनों बाद मिट भी जाएगी,,पर मेरे लिए तो कभी ना भूलने वाली रात बनकर रह गई॥महज कुछ दिनो पहले तक, मैं भी उस ख़ूनी रास्ते की रोज़ की यात्री थी; और लगभग रोज़ ही रेल पर दौडती उस मौत से सामना होता ही था॥बहुत बार खुद की भी जान बचाई और बहुत बार दूसरों की जान जाते हुए भी देखा, मगर ये हादसा अपने साथ बहुतों की ज़िन्दगी बदल गया।
   जाने क्यूं मुझे बिलासपुर आने की जल्दी थी उस दिन,,अपने घर आने की जल्दी तो सब को होती है, मुझे भी थी। आडवानी जी की यात्रा ने पहले ही हलाकान कर रखा था,सारा रायपुर शहर उत्सव में डूबा हुआ था;इसी चक्कर में दो गाडियां छूट गई। जैसे तैसे स्टेशन पहुंची तो पतिदेव का फ़ोन आ गया कि,,यहां हादसा हुआ है,शायद गाडी लेट हो जाए। पर मैं तो जैसे उड कर आने को भी तैयार थी।
आखिरकार रात को जैसे ही गाडी में अपनी सीट संभाली वैसे ही फ़िर से पतिदेव का संदेसा; पर इस बार बहुत परेशान स्वर और सीधे आदेश दे दिया कि अभी मत आओ, कल आना। फ़ायरिंग, आगजनी और हुल्लड की दुहाई देकर कहा, चुपचाप वापस जाओ।
मेरे दिमाग में तो रायपुर का मंज़र घूम गया फ़िर वापस जाने की हिम्मत नही हुई तो ;;पर मैं तो मैं हूं… पहले ही ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए आज तो या मैं नही या कुछ भी नही। पतिदेव को झूठ बोला कि ट्रेन  तो चल पडी है, अब क्या करुं?? उन्होने कहा ठीक है आ जाओ देखते है॥ बस फ़िर क्या था मै चल पडी॥ और जैसा होना था वैसा ही हुआ। जैसे ही ट्रेन चली अफ़वाहो ने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया। कोई कह रहा था, सारी ट्रेनों  को रोका जा रहा है। किसी ने कहा कि पथराव हो रहा है और हद तो तब हुई जब एक ने कहा ट्रेन में ही आग लगा दी गई है॥ उस समय तो मै सोचने लगी कि अगर इस गाडी मे भी आग लगी तो कैसे और कहां से निकलना है।(बाद मे सोचा तो खूब हंसी) ख़ैर मैने उस दिन ये जाना कि लोगो की कल्पनाएं और ज़बान दुनिया की सबसे तेज़ चीज़ें है।
   धीरे धीरे सरकती गाडी ने आखिरकार तिल्दा में आकर आगे जाने से इनकार कर दिया। और मेरे फ़ोन पे मैसेज और कॉल  की आवाजाही ने मुझे हरपल  ये अहसास दिलाया कि मैं अकेली नही। सबके प्यार और चिंताओं ने सच मे बहुत सहारा दिया। और इतनी भूख लगी थी मुझे, साथ ही पानी भी खत्म हो गया था,कोल्डड्रिंक  का अहसान मैं कभी नही उतार सकूंगी। एक घंटे बीतते बीतते डर लगने लगा और भूख प्यास हवा हो गई। मेरे सेलफ़ोन ने भी साथ देने से इनकार कर दिया।
 तैंतीस कोटि देवों को याद कर लिया मैने और गाडी ने सरकना शुरु किया। मन में एक उम्मीद जगी। फ़िर इसी तरह रुकते चलते फ़ाईनली रात को ढाई बजे मैने बिलासपुर स्टेशन में कदम रखा। पतिदेव के चिन्तित चेहरे पर खुशी की लहर देखी मैनें और पास खडे एक सज्जन ने बताया कि आपके लिए ये रात को बारह बजे से यहां पर खडे परेशान हो रहे है और पल पल की खबर ले रहे है। आप बहुत खुशकिस्मत है। सच में मैं रो पडी। घर पहुंचकर जो डांट पडी वो भी बहुत भली लगी॥
रास्ते में वो ख़ौफ़नाक,वीरान जगह भी देखी जहां आठ घंटे मे ही लोग बदहवास होकर खामोश भी हो गए थे। एक अज़ीब सा सन्नाटा था वहां। पता नही अब उनके घरों में कभी दीवाली होगी भी या नही पर मैं और मेरे जैसे बहुत लोग तक़दीर वाले है जो आज की काली रात में दिये जला रहे है और कल की अमावस में आतिशबाजियां भी चलाएंगे।
ईश्वर उनके अपनों को हिम्मत दे और उनको भूलने की ताक़त जिन्होनें अपनी आंखों से ये दहशत देखी है। बहरहाल “शुभ-दीपावली”

Sunday 2 October 2011

hum me hai hero !!!!!!

हम में है हीरो……
पेट्रोल के बढे हुए दाम की ख़बर हर दिन लगभग हर न्यूज़ चैनल और अखबार में आती ही रहती है। आम आदमी इतना परेशान और किसी बात से नही जितना महंगाई से है। एसी कमरों में बैठकर अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों की उथल-पुथल और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत की बातें करने वाले, ये नही जानते है शायद कि रोज़ाना खाने-पीने के सामान से लेकर,दवाई,स्कूल-कॉलेज की फ़ीस,किताब,कॉपी,ड़ॉक्टर,आने-जाने की तक़लीफ़ और अनायास ही प्रकट होने वाले ख़र्चों के साथ खुद को “हर एक” कितना अकेला, परेशान और मजबूर पाता है।
         घर से सुबह निकलने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह सोचता है कि कैसे चार पैसे ज्यादा कमा ले; ताकि बीवी को एक अदद डिनर करा सके, ताकि बच्चे को उसका मनपंसद खिलौना लाकर दे सके। गृहणी सोचती है कि, गैस सिलेंडर को किस तरह किफ़ायत से चलाय कि वो पहले से कुछ दिन और ज्यादा खिंच सके।बच्चों और पति की खाने-पीने की फ़रमाईशों कि कैसे पूरा करे???
मध्यम वर्ग की इस ज़द्दोज़हद को ना तो उच्च वर्ग समझता है और ना ही निम्न वर्ग को इन सबसे कोई मतलब है।चाहे रिश्तेदारियां निभाना हो या सामाजिक सरोकार,कोई भी बंधन ,व्यवहार,रीत-चलन,कर्त्तव्य  और अधिकार इन सब का अकेले ठेका इसी ‘जिम्मेदार’ वर्ग ने ले रखा है।
       सचिन के शतक ना बनाने पर नाराज़ होने से लेकर ,अमेरिका में प्रेसीडेंट क्यों और क्या कर रहे है; तक मध्यम वर्ग की पकड मजबूत है॥चोरी,डकैती,लूट,आतंकवाद से लेकर बम-ब्लास्ट का शिकार भी सबसे अधिक यही वर्ग होता है। अन्ना हजारे के समर्थन में मज़मा लगाना हो या फ़िर सारेगामा में विनर के लिए वोटिंग करनी हो। अमरसिंह को जेल जाना हो या एश्वर्या की प्रेग्नेंसी न्यूज़,,यही मिडिल क्लास हर जगह अपनी जागरुक उपस्थिति दर्ज कराता है।
समय के समानांतर चलते हुये,समाज की ये मुख्य धारा हर युग हर कालखंड में बलिदान करती आई है परंतु ये भी सच है कि मानो जीवन और समाज का अस्तित्व भी इससे ही है। अभावों और संघर्षों में भी जीने की अदम्य इच्छा  रखने वाला और स्वाभिमान को सर्वोपरि मानने वाला ये वर्ग घोर निराशा में भी हमेशा मुस्कुराता है। परंपराओं ,संस्कारों के संरक्षण का महान उत्तरदायित्व भी इसी के कांधों पर रहता है।हर समस्या को “अपनी” समस्या मानकर सोचने समझने और तर्क करने वाला ये वर्ग ही देश की आवाज़ है।
रहमान के लेटेस्ट गाने की लाईनें “हम में है हीरो” शायद इसी के लिए लिखी गई है। इतिहास साक्षी है कि समाज में कोई भी परिवर्तन हो, सबसे पहले यही वर्ग आगे बढकर उसे गले लगाता है। गोया कि हर हालात से तालमेल बिठाना और आगे बढते जाना ही मिडिल क्लास की तक़दीर है।
फ़िलहाल एक बार फ़िर मध्यम वर्ग की सतह पर हलचल हुई है और लहरों ने आने के संकेत दिए है। आधुनिक धुनों पर नाचनें, नये-नये गैजेट्स उपयोग करने, मॉल के हर कोने पर छा जाने(भले ही विंडो शॉपिंग के लिए) और हर छोटी बडी बातों में खुशियां तलाशने वाला ये सर्वाधिक शिक्षित वर्ग एक बार फ़िर कुछ बदलाव होने की आस लिए आसमान को ताक़ रहा है।
      जाने कब ये स्वयं की शक्ति को पहचानेंगे?? मेरे विचार से तो अभी लोहा गरम है और हथौडे में भी गरमी है; फ़िर मारने में देर क्यूं?? कहीं ऐसा ना हो कि महंगाई और भ्रष्टाचार इस भोले-भाले वर्ग को पूरी तरह निगल जाये और देश में केवल दो वर्ग रह जाएं जिनको हर हाल में सिर्फ़ और सिर्फ़ अप्रभावित रहना है।ईश्वर कहीं तो ऐसी आग जलाए जिसकी तपन मध्यम वर्ग तक पहुंच कर उसे नींद से जगा दे॥ आमीन…

Wednesday 14 September 2011

क्या हक़ है…

क्या हक़ है मुझे परेशां करने का तूम्हें
कि ये बेक़रारी जान ही ले जाएगी
कोई दीवाना हो गया तुम्हारे इंतज़ार में
अब ये बात दूर तलक जाएगी…

दिन में सौ दफ़े आसमान को ताकती हूं मैं
सोचती हूं लंबी घडियां कटे कैसे
शाम तक अपना साया भी छोड देता है तन्हा मुझको
ना जाने तेरी याद कैसे दिल से जाएगी…

औरों पे हंसने वाली मै, ख़ुद मज़ाक बन गई
रात तेरे ख़्वाबों से रोशन होकर ढल गई
अभी और क्या देखना है इस इश्क़ में ज़ालिम
मेरे हाल पे तो पत्थर से भी रुलाई फूट जाएगी…

बस इतना रहम और कर,मुझपे मेरे चाहने वाले
इतनी सांसें दे उधार कि बस तुझसे प्यार कर लूं
ज़िंदगी के वीराने में बस यादों के है डेरे
मौत पे भी शायद ये रुह जिस्म छोडकर जाएगी…  
                                                                      “स्वधा”

Thursday 8 September 2011

हसीन फ़ंदा……

दो महीने बाद ही शादियों का मौसम शुरु हो जाएगा॥ मेरे एक मित्र की भी शादी होने वाली है,,और वो इस खूबसूरत फांसी के फंदे को गले लगाने के लिये बेताब है। जिनकी शादी होने वाली है वो लडके सितारों की दुनिया में है; और लडकियां सितारों से  भी आगे निकल चुकी है।इन लोगों के लिए ये पल उनकी ज़िंदगी के सर्वाधिक हसीन लम्हे है जो,सारी ज़िंदगी उन्हें गुदगुदाएंगे॥
            माता-पिता के लिए बच्चों का विवाह धर्मसंकट का क्षण होता है। बचपन से ही जिन्हें लाड से पाला है ; उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र से निकालकर दूसरों को सौंप दो। बेटी के विवाह पर दुख इसलिए अधिक होता है,क्योकि वो आँखों से उम्र भर के लिए दूर होती है परंतु हृदय के सदैव पास रहती है।जबकि पुत्र के विवाह पर प्रसन्नता होती है क्योंकि हम पराई बेटी को घर लाते है।वास्तविकता यह है कि बेटे अपनी शादी के कुछ समय पहले से ही पराये हो जाते है। हृदय की दूरी से आँखों की दूरी भली होती है।
      पुत्र एक साथ एक घर में रहकर भी दूर हो जाते है।इस शाश्वत नियम के पीछे किसी की गलती नही होती है। माताएं पूर्वाग्रह से ग्रसित होतीं है; इसलिए विवाह के बाद अपना ही पुत्र पराया लगने लगता है और पुत्रवधू सबसे बडी दुश्मन। ऐसा क्यों होता है?????
मेरे विचार से, पुत्र की भूमिकाएं अकस्मात ही परिवर्तित हो जाती है। मां के आंचल में सोने वाला लाडला अचानक ही पत्नी का ‘परमेश्वर’ बन जाता है।पुत्र के विचार से देखे तो; अपने माता-पिता और भाई- बहनों के समक्ष प्रभाव जमाने की कोई आवश्यकता ही नही है, परंतु पत्नी के समक्ष प्रभाव जमाना तो परम आवयश्क है। क्योंकि यदि उसका सम्मान प्राप्त करना है तो उसे प्रेम और संरक्षण देना ही पडेगा,यह सत्य भी है। परंतु पत्नी को दिया गया यही प्रेम और संरक्षण अन्य सभी की आँखों में खटकने लगता है॥ है ना??
भारत में विवाह और ससुराल की परंपरा अभी तक तो कायम है,ये देखकर भला लगता है, पर हां सास –बहू के संबंध निम्न वर्ग से उच्च वर्ग तक एक समान है। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सुश्री इंदिरा गांधी की अपनी छोटी बहू से कभी नही बनी। ग्वालियर की राजमाता ने अपनी बहू को कहा कि –इसे राजपरिवार के नियम नही पता,,यहां तक कि ब्रिटेन की महारानी ने अपनी बहू डायना को कभी मन से स्वीकार नही किया॥अब क्या इन रईस सासों को अपनी बहू के नखरे सहना है या फ़िर रसोई में काम करवाना है? ना धन की चिंता, ना काम-काज और गृहस्थी सँभालने की,फ़िर भी उनके संबंध कभी सामान्य नही रहे। कहने का अर्थ ये है कि कुछ चीज़ें शाश्वत और पारंपरिक है अर्थात हर सास “सास” होती है और हर बहू “बहू” होती है।
  इन डेली सोप के इतने हिट होने के पीछे हर सास-बहू य फ़िर हर स्त्री के मन की दास्तान है। सीरियल्स के चरित्रों द्वारा अजीब-अजीब चेहरे बनाना, मन ही मन में बात करना ये सब वास्तविक जीवन में भी घटित होता है। परंतु इन संबंधों में प्रेम है,नफ़रत में अपनत्व है और अकेलेपन में भी सहारा है। परिवार की जड बहुत मज़बूत है और एक ही परिवार के होने का भाव ही समाज की निरंतरता का मूल है॥
बहरहाल ईश्वर सभी शादी करने वालों के स्वप्न पूरे करे और ताउम्र उन्हें जीवन की रंगीनियां नसीब हो। शादी मुबारक!!!
“ये सब दिल से लिखा है यारों,,आखिर एक महिला से आप और क्या उम्मीद करते है???”

Tuesday 6 September 2011

JAADOO HAI..........NASHA HAI......

जादू है नशा है,,
दुनिया गोल है,ये मैने सुना था पर अब दिल से अनुभव भी करती हूं। आज से तीस साल पहले विज्ञान की फ़ंतासी कथाएं लिखते समय लोग इस कल्पना को अक्सर शामिल किया करते थे कि,मनुष्य के पास ऐसी मशीन होगी जिससे वह पलक झपकते ही और एक बटन दबाकर सात समंदर पार की सूचना जान सकेगा,कुछ भी मनचाहा प्राप्त कर सकेगा और जिसे जब चाहे जैसा देख सकेगा। ये केवल मानव मन की कल्पना है जो आज उसके प्रयासों से साकार हो चुकी है।
      इंटरनेट एक जादुई दुनिया है,और मानव की क्रांतिकारी सफलता है।कितना सरल हो गया है अपने मित्रों से बात करना,उनकी तस्वीर। देखना,उनकी आवाज़ सुनना और जानकारियां देने के लिए बहुत सारी साइटों  का जमावडा है।बिलासपुर की एक लडकी शिकागो में अपनी सखी से नही मिल सकती पर, अपनी सहेली को अपनी बात अपनी आवाज़ और तस्वीर के साथ बता ज़रुर सकती है।सबकुछ बहुत अद्भुत और रोमांचक है॥
वो भाग “जादू” था, और अब ये अंश “नशे” की कहानी कहेगा…इंटरनेट एक नशा बनता जा रहा है या कहिए बन चुका है। हम जितने एक्टिव इस दुनिया में रहते है,उतने असली जीवन में भी नही है शायद। मेरी उंगलियां इस बोर्ड पर जितना तेज़ भागतीं है,उतना अब ब्लैकबोर्ड पर नही भागती।जिनके बारे में कभी सोचा भी नही था,आज वो सब दोस्तों की सूची में जगह बना चुके है। एक-दूसरे के विचार जान रहे, पसंद-नापसंद पूछ रहे, स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे ऐसे लोगों की दुनियां है; जो अपने ही वज़ूद को पहचान रहे है। अगर ऐसा नही है तो फ़िर क्या है जो अजनबियों को भी बाँधकर रखता है??
      इन अनजान लोगों में एक बात कॉमन है,वो है ज़िंदगी में कुछ ना कुछ तलाश करना। सबकी अलग –अलग कहानी है,अलग ज़रुरतें है, अलग फ़साना है फ़िर भी सबका एक ही सुर है- “ हम साथ साथ है। और यही हम सब की वास्तविक आवश्यकता  भी है। तन से दूर रहकर भी मन से जुडे रहना ही असली और खरा रिश्ता है।
और रही बात इस नशे से दूर रहने की तो इसके भी फ़ायदे और नुकसान है। जीवन की आपाधापी से कैसे भी हो,,इस के लिए समय मिल ही जाता है !! और कुछ पल के लिए ही सही सुकून भी है,,ठीक किसी नशे की तरह। तो इससे दूर रहना भी फ़िलहाल कठिन लगता है। क्योकि हमे जिस वस्तु से दूर रहने की हिदायत होती है,हम उसी के पास जाना चाहते है। अजीब प्रवृत्ति होती है मानव मन की। मन के चंचल घोडे को थामना सरल है पर हम खुद उसे सम्भालना नही चाहते,,क्यो??इसके कारण अज्ञात है…
  एक एक सोलह साल की लडकी कि उसके सारे हितैषी कहेंगे कि फलां लडका गुंडा है,बेवकूफ़ है,फ़्लर्ट है और तुमको धोखा दे देगा;उसके इश्क़ में मत पडना। मगर लडकी ने कसम खा रखी है कि वह उस लफंगे को ही प्यार करेगी॥ये तो एक उदाहरण दिया है,,पर हम भी पूरी ताक़त से अपने दिमाग के विचार को दरकिनार कर मन के घोडे छोड रहे हैं॥थामना पडेगा इसे !! है ना??

Saturday 3 September 2011

Dosti wid Pyar

          दोस्ती   यार”
*प्यार और दोस्ती में इतना फ़र्क पाया है
प्यार ने सहारा दिया,दोस्त ने साथ निभाया है
किस रिश्ते को गहरा कहूं ,,
एक ने ज़िंदगी दी तो दूसरे ने जीना सिखाया है…*
         इन चार लाईनो ने प्रेम और मित्रता के बीच की झीनी सी परत को कितनी सरलता से उजागर कर दिया है। दुनिया में किसी से पूछा जाए कि –दोस्ती और प्यार में अधिक ज़रुरी क्या है? तो बिना एक भी पल गँवाए उत्तर मिल जाएगा कि ‘दोस्ती’। पर हमेशा से प्यार दोस्ती पर भारी पड जाता है; अक्सर दो मित्रों के बीच प्रेम आ जाता है और दोस्त को कॉम्प्रोमाइज़ करना पडता है(यदि उसे दोस्त का प्यार पसंद नही है तो)। ऐसी कौन सी बात है जो लोग अपने पुराने दोस्त को नवेले प्यार के कारण छोडने से भी नही हिचकिचाते है॥
       मुझे ‘दिल चाहता है’ का वह दृश्य हमेशा याद आता है,जिसमें सिड,आकाश को यह कहकर थप्पड मारता है कि- हर रिश्ते की एक सीमा होती है और आज तूने वो हद तोड दी। मैं आज भी नही कह सकती कि दोनो में से कौन सही था,,सिड अपनी उस मोहब्बत का बखान  कर रहा होता है जो,उम्रज़दां भी है और समझ से बाहर भी,हालांकि आकाश ने बेहूदा बात की थी मगर वो भी गलत नही था।कोई भी सच्चा दोस्त ये कभी नही चाहेगा कि उसका युवा दोस्त किसी अधेड के प्रेम में पागल हो जाए। फ़िर भी मेरा निजी विचार है कि इस प्रकरण में थप्पड नही होना चाहिए था।
मानव जीवन की बहुत अच्छी बात ये है कि; उसे दोस्ती की अहमियत मालूम होती है।दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति का भी कोई ना कोई हमराज़ मित्र अव्श्य होता है। हम हर रिश्ते नाते,भाई बहन प्रेमी सभी से धोखा खाकर सँभल  जाते है और भूल भी जाते है पर दोस्तों से दगा पाकर सँभलना कठिन हो जाता है। मुझे अपनी एक ऐसी दोस्त बहुत याद आती है,जिसे उसके प्यार ने मुझसे दूर कर दिया और आज आलम ये है कि हम सच में दूर होकर भी खुश है॥पर ये झूठ है॥
       बचपन के दोस्त बडे होने पर अपनी ज़िम्मेदारियों,शादी,परिवार,नौकरी आदि कारणों से भले दूर हो जाते है,मगर बचपन की मीठी यादें आजीवन साथ रहती है। परंतु लडकर अलग होना या कभी कभी बगैर लडे ही अलग होने पर मित्र भूलकर भी एक-दूसरे को याद नही करते या करना ही नही चाहते पर यही विडम्बना है,इस वास्तविक जीवन की॥ हर कोई अपने मित्र को सबसे अच्छा समझता भी है और कहता भी है क्योकि उसके मित्र की आदतें उसकी अपनी आदतों के समान होती है;तभी तो मित्रता है।इसलिए हमें ना तो किसी  के दोस्तों के बारे में कुछ बुरा कहना चाहिए और ना ही अपने दोस्तों के बारे में बुरा सुनना चाहिए।
       एक संगीतकार  और कल्पनाकार मित्र थे। जब संगीतकार बहती नदी और झरने के गीत छेडता ,तो मित्र कहता; “वाह कितनी सुंदर साफ़ कलकल करती नदी है,मन करता है भीग जाऊं” ॥ जब संगीतकार  पहाडी धुनों की तान सुनाता तो मित्र कहता “कितने ऊँचे  और सुंदर पहाड है चलो वहीं बस जाए” ॥ एक दिन कल्पनाकार मित्र की मृत्यु हो गयी और बस तभी से संगीतकार  ने धुन बजाना हमेशा के लिये छोड दिया। यही है ना असली दोस्ती पर प्यार से शुरु किया था,तो प्यार पे ही खत्म करेंगे ---
“ प्यार कहता है तुम्हारे साथ  कुछ भी होगा तो मैं साथ रहूंगा हमेशा,,दोस्ती कहती है यदि मैं तुम्हारे साथ रहूंगी तो कुछ भी गलत होने ही नही दूंगी कभी”
यारों दोस्ती बडी हसीन है सच में……

Friday 26 August 2011

best relationshp in the world........

the best poetry i ever read...dedicated to my "maa"



                                       मां के घर बिटिया जन्मे…बिटिया के घर मां…
बुने हुए स्वेटर में, मां ने भेजा है पैगाम,
देहरी आंगन द्वार बुलाते,कब आएगी अपने गांव??
अरसा बीता ब्याह हुए,क्या अब भी आती मेरी याद,
कैसी है तू?? धडक रहा मन,लौटी ना बरसों के बाद।
मोर, कबूतर अब भी छत पर,दाना चुगने आते है,
बरसाती काले बादल,तेरा पता पूछकर जाते है।
रात की रानी की खुश्बू में,तेरी महक समाई है,
हवा चले तो यूं लगता है,जैसे बिटिया आई है।
आज भी ताज़ा लगते है,हल्दी के थापे हाथों के,
एक-एक पल याद मुझे बचपन की बातों के॥

सीवन टूटी जब कपडों की,या उधडी जब तुरपाई,
कभी जला जब हाथ तवे पर,अम्मा तेरी याद आई।
छोटी छोटी लोई से मै,सूरज चांद बनाती थी,
जली-कटी उस रोटी को तू,बडे चाव से खाती थी।
जोधपुरी बंधेज सी रोटी,हाथ पिसा मोटा आटा,
झूमर था भाई- बहन का,कौर कौर हमने बाँटा ।
गोल झील सी गहरी रोटी,उसमे घी का दर्पण था,
अन्न्पूर्णा आधी भूखी, सब कुटुम्ब को अर्पण था।
अब समझी मैं ,भरवां सब्जी,आखिर में क्यो तरल हुई??
जान लिया है मां बनकर ही,औरत इतनी सरल हुई।
ज्ञान हुआ खूंटे की बछिया,क्यो हर शाम रम्भाती थी,
गैया के थन दूध छलकता,जब जंगल  से आती थी।
मेरे रोशनदान में भी अब, चिडिया अंडे देती है,
खाना-पीना छोड उन्हे फ़िर,बडे प्यार से सेती है।
गाय नही पर भूरी कुतिया,बच्चे देनेवाली है,
शहर की इन सूनी गलियों में, रौनक छानेवाली है।

मेरे ही अतीत की छाया,इक सुंदर सी बेटी है,
कन्धे तक तो आ पहुची, मुझसे थोडी छोटी है।
यूं भोली है लेकिन थोडी,जिद्दी है मेरे जैसी ,
चाहा मैने न बन पाई,मै खुद भी तेरे जैसी।
अम्मा तेरी मुनिया के भी,पकने लगे रेशमी बाल,
बडे प्यार से तेल रमाकर,तूने की थी सार-संभाल्।
जब से गुडिया मुझे छोड, परदेस गई है पढने को,
उस कुम्हार सी हुई निठ्ठ्ली,नही बचा कुछ गढने को।

तूने तो मां बीस बरस के, बाद मुझे भेजा ससुराल,
नन्ही बच्ची देस पराया,किसे सुनाऊं दिल का हाल्।
तेरी ममता की गर्मी,अब भी हर रात रुलाती है,
बेटी की जब हूक उठे तो,याद तुम्हारी आती है।
जनम दोबारा तेरी कोख से,तुझसा ही जीवन पाऊं
बेटी हो हर बार मेरी फ़िर उसमें खुद को दोहराऊं॥

Monday 22 August 2011

THATS LOV

ठंडी  रातों में जागती आंखों में
जब आदतन मुझे खोजता होगा
भर के तकिया अपनी बांहों में
धीरे से आंसू पोंछता होगा।

हर साये पर चौककर वो
मेरे अहसास बुझाता होगा
मेरी बांहों के सिरहाने को तरसता
मेरी यादों  में खो जाता होगा।

मेरे ही सपने खुली आंखों  से
अश्क बन कर ढलकते होंगे
दिल में हर रात मुझसे मिलने के
कितने ज़ज़्बात सुलगते होंगे।

कितनी बार अपने दिल को समझाकर
उसने दिनरात गुजारे होंगे
कितनी अधूरी तम्मनाओं के सिलसिलें
मेरे ही वज़ूद के सहारे होंगे।

मुझे पाकर खो देने का
उसे आज भी ग़म होता होगा
भीड में भी तन्हा, उदास
मेरे ख्यालों में वो खोता होगा।
मुझे पाने की उम्मीद पर
पल-पल वो रोज़ रोया होगा
मुझको है जब नींद नहीं आती
कैसे मानूं कि वो सोया होगा॥