Thursday 8 September 2011

हसीन फ़ंदा……

दो महीने बाद ही शादियों का मौसम शुरु हो जाएगा॥ मेरे एक मित्र की भी शादी होने वाली है,,और वो इस खूबसूरत फांसी के फंदे को गले लगाने के लिये बेताब है। जिनकी शादी होने वाली है वो लडके सितारों की दुनिया में है; और लडकियां सितारों से  भी आगे निकल चुकी है।इन लोगों के लिए ये पल उनकी ज़िंदगी के सर्वाधिक हसीन लम्हे है जो,सारी ज़िंदगी उन्हें गुदगुदाएंगे॥
            माता-पिता के लिए बच्चों का विवाह धर्मसंकट का क्षण होता है। बचपन से ही जिन्हें लाड से पाला है ; उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र से निकालकर दूसरों को सौंप दो। बेटी के विवाह पर दुख इसलिए अधिक होता है,क्योकि वो आँखों से उम्र भर के लिए दूर होती है परंतु हृदय के सदैव पास रहती है।जबकि पुत्र के विवाह पर प्रसन्नता होती है क्योंकि हम पराई बेटी को घर लाते है।वास्तविकता यह है कि बेटे अपनी शादी के कुछ समय पहले से ही पराये हो जाते है। हृदय की दूरी से आँखों की दूरी भली होती है।
      पुत्र एक साथ एक घर में रहकर भी दूर हो जाते है।इस शाश्वत नियम के पीछे किसी की गलती नही होती है। माताएं पूर्वाग्रह से ग्रसित होतीं है; इसलिए विवाह के बाद अपना ही पुत्र पराया लगने लगता है और पुत्रवधू सबसे बडी दुश्मन। ऐसा क्यों होता है?????
मेरे विचार से, पुत्र की भूमिकाएं अकस्मात ही परिवर्तित हो जाती है। मां के आंचल में सोने वाला लाडला अचानक ही पत्नी का ‘परमेश्वर’ बन जाता है।पुत्र के विचार से देखे तो; अपने माता-पिता और भाई- बहनों के समक्ष प्रभाव जमाने की कोई आवश्यकता ही नही है, परंतु पत्नी के समक्ष प्रभाव जमाना तो परम आवयश्क है। क्योंकि यदि उसका सम्मान प्राप्त करना है तो उसे प्रेम और संरक्षण देना ही पडेगा,यह सत्य भी है। परंतु पत्नी को दिया गया यही प्रेम और संरक्षण अन्य सभी की आँखों में खटकने लगता है॥ है ना??
भारत में विवाह और ससुराल की परंपरा अभी तक तो कायम है,ये देखकर भला लगता है, पर हां सास –बहू के संबंध निम्न वर्ग से उच्च वर्ग तक एक समान है। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सुश्री इंदिरा गांधी की अपनी छोटी बहू से कभी नही बनी। ग्वालियर की राजमाता ने अपनी बहू को कहा कि –इसे राजपरिवार के नियम नही पता,,यहां तक कि ब्रिटेन की महारानी ने अपनी बहू डायना को कभी मन से स्वीकार नही किया॥अब क्या इन रईस सासों को अपनी बहू के नखरे सहना है या फ़िर रसोई में काम करवाना है? ना धन की चिंता, ना काम-काज और गृहस्थी सँभालने की,फ़िर भी उनके संबंध कभी सामान्य नही रहे। कहने का अर्थ ये है कि कुछ चीज़ें शाश्वत और पारंपरिक है अर्थात हर सास “सास” होती है और हर बहू “बहू” होती है।
  इन डेली सोप के इतने हिट होने के पीछे हर सास-बहू य फ़िर हर स्त्री के मन की दास्तान है। सीरियल्स के चरित्रों द्वारा अजीब-अजीब चेहरे बनाना, मन ही मन में बात करना ये सब वास्तविक जीवन में भी घटित होता है। परंतु इन संबंधों में प्रेम है,नफ़रत में अपनत्व है और अकेलेपन में भी सहारा है। परिवार की जड बहुत मज़बूत है और एक ही परिवार के होने का भाव ही समाज की निरंतरता का मूल है॥
बहरहाल ईश्वर सभी शादी करने वालों के स्वप्न पूरे करे और ताउम्र उन्हें जीवन की रंगीनियां नसीब हो। शादी मुबारक!!!
“ये सब दिल से लिखा है यारों,,आखिर एक महिला से आप और क्या उम्मीद करते है???”

1 comment:

  1. अच्‍छा है।
    सास बहु पर केन्द्रित सीरियलों और वास्‍तविक जीवन में काफी कुछ अंतर होता है और मेरा मानना है कि यही अंतर इन सीरियलों की लोकप्रियता का भी कारण है। लोग चाह कर भी वैसा व्‍यवहार नहीं कर सकते और इसलिए वो सीरियलों के माध्‍यम से ये सब देखते हैं। क्‍या वास्‍तविक जीवन में ऐसा कुचक्र, परिवार के भीतर एक दूसरे को लेकर इतनी नफरत होती है.... जवाब नहीं में ही आएगा..... कोई चाहकर भी नहीं कर सकता... ऐसे में सीरियलों को देखकर ही मन को शांत कर लिया जाता है.... ये अलग बात है कि लोग कहें कि इन सीरियलों ने घरों का माहौल बिगाड दिया है.... पर मेरा सोचना है कि इन सीरियलों में ही बिगडते माहौल को देखकर लोग तसल्‍ली कर ले रहे हैं और इस पर अमल नहीं कर रहे हैं।
    आपने विवाह संस्‍कार और बेटे और बेटियों से बात शुरू कर डेली सोप पर बात ख
    त्‍म की और मैंने अपनी बात इन डेली सोप से शुरू की।
    बेटियों की शादी के बाद वो पराई हो जाती हैं और बेटे की शादी के बाद पराई बेटी अपने घर आ जाती है.... इस पर मेरा मानना यह है कि बेटी शादी के बाद शरीर से भले ही दूर हो जाए पर हृदय के और करीब आ जाती है लेकिन बेटा शादी के बाद भले ही शरीर से साथ्‍ा रहे पर वो हृदय के उतना करीब नहीं रह पाता।
    मसले का एक पहलू यह भी है जिस पर विचार करना जरूरी है कि आपके घर दूसरे की बेटी आती है..... कभी आप भी किसी के घर बहू बनकर गई रही होंगी.... इसलिए बहु के साथ व्‍यवहार करते वक्‍त अहसास हो कि सास भी कभी बहू थी....
    बहरहाल, अच्‍छा विषय।

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