Saturday 3 September 2011

Dosti wid Pyar

          दोस्ती   यार”
*प्यार और दोस्ती में इतना फ़र्क पाया है
प्यार ने सहारा दिया,दोस्त ने साथ निभाया है
किस रिश्ते को गहरा कहूं ,,
एक ने ज़िंदगी दी तो दूसरे ने जीना सिखाया है…*
         इन चार लाईनो ने प्रेम और मित्रता के बीच की झीनी सी परत को कितनी सरलता से उजागर कर दिया है। दुनिया में किसी से पूछा जाए कि –दोस्ती और प्यार में अधिक ज़रुरी क्या है? तो बिना एक भी पल गँवाए उत्तर मिल जाएगा कि ‘दोस्ती’। पर हमेशा से प्यार दोस्ती पर भारी पड जाता है; अक्सर दो मित्रों के बीच प्रेम आ जाता है और दोस्त को कॉम्प्रोमाइज़ करना पडता है(यदि उसे दोस्त का प्यार पसंद नही है तो)। ऐसी कौन सी बात है जो लोग अपने पुराने दोस्त को नवेले प्यार के कारण छोडने से भी नही हिचकिचाते है॥
       मुझे ‘दिल चाहता है’ का वह दृश्य हमेशा याद आता है,जिसमें सिड,आकाश को यह कहकर थप्पड मारता है कि- हर रिश्ते की एक सीमा होती है और आज तूने वो हद तोड दी। मैं आज भी नही कह सकती कि दोनो में से कौन सही था,,सिड अपनी उस मोहब्बत का बखान  कर रहा होता है जो,उम्रज़दां भी है और समझ से बाहर भी,हालांकि आकाश ने बेहूदा बात की थी मगर वो भी गलत नही था।कोई भी सच्चा दोस्त ये कभी नही चाहेगा कि उसका युवा दोस्त किसी अधेड के प्रेम में पागल हो जाए। फ़िर भी मेरा निजी विचार है कि इस प्रकरण में थप्पड नही होना चाहिए था।
मानव जीवन की बहुत अच्छी बात ये है कि; उसे दोस्ती की अहमियत मालूम होती है।दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति का भी कोई ना कोई हमराज़ मित्र अव्श्य होता है। हम हर रिश्ते नाते,भाई बहन प्रेमी सभी से धोखा खाकर सँभल  जाते है और भूल भी जाते है पर दोस्तों से दगा पाकर सँभलना कठिन हो जाता है। मुझे अपनी एक ऐसी दोस्त बहुत याद आती है,जिसे उसके प्यार ने मुझसे दूर कर दिया और आज आलम ये है कि हम सच में दूर होकर भी खुश है॥पर ये झूठ है॥
       बचपन के दोस्त बडे होने पर अपनी ज़िम्मेदारियों,शादी,परिवार,नौकरी आदि कारणों से भले दूर हो जाते है,मगर बचपन की मीठी यादें आजीवन साथ रहती है। परंतु लडकर अलग होना या कभी कभी बगैर लडे ही अलग होने पर मित्र भूलकर भी एक-दूसरे को याद नही करते या करना ही नही चाहते पर यही विडम्बना है,इस वास्तविक जीवन की॥ हर कोई अपने मित्र को सबसे अच्छा समझता भी है और कहता भी है क्योकि उसके मित्र की आदतें उसकी अपनी आदतों के समान होती है;तभी तो मित्रता है।इसलिए हमें ना तो किसी  के दोस्तों के बारे में कुछ बुरा कहना चाहिए और ना ही अपने दोस्तों के बारे में बुरा सुनना चाहिए।
       एक संगीतकार  और कल्पनाकार मित्र थे। जब संगीतकार बहती नदी और झरने के गीत छेडता ,तो मित्र कहता; “वाह कितनी सुंदर साफ़ कलकल करती नदी है,मन करता है भीग जाऊं” ॥ जब संगीतकार  पहाडी धुनों की तान सुनाता तो मित्र कहता “कितने ऊँचे  और सुंदर पहाड है चलो वहीं बस जाए” ॥ एक दिन कल्पनाकार मित्र की मृत्यु हो गयी और बस तभी से संगीतकार  ने धुन बजाना हमेशा के लिये छोड दिया। यही है ना असली दोस्ती पर प्यार से शुरु किया था,तो प्यार पे ही खत्म करेंगे ---
“ प्यार कहता है तुम्हारे साथ  कुछ भी होगा तो मैं साथ रहूंगा हमेशा,,दोस्ती कहती है यदि मैं तुम्हारे साथ रहूंगी तो कुछ भी गलत होने ही नही दूंगी कभी”
यारों दोस्ती बडी हसीन है सच में……

3 comments:

  1. दोस्त आइना है , हर उन खाश - आम बातो को दिखता है , प्यार को अँधा कहा जाता है , मन में उठे इन बातो को लिखते हुए कहना चाहता हु बहुत ही खूब सूरती के साथ बया की है आपने , लेखनी को विश्राम नहीं देकर अविरल बहते जाना आपका स्वाभाव तभी तो स्वधा हो आप ...........बहुत खूब ....अच्छा वर्णन....तभी तो .एक स्वर में कहने को मजबूर हुआ आप की ही पंक्ति .....यारों दोस्ती बडी हसीन है सच में……

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  2. कुछ हद तक सहमत... कुछ हद तक असहमत।
    दोस्‍ती तब तक बेहतर है जब उसमें किसी प्रकार का अहम न हो, लालच न हो.... जहां पाने की लालसा न हो वहां तक दोस्‍ती होती है और जहां पर पाने की लालसा आ जाती है... वहां से प्‍यार शुरू हो जाता है....
    कहते तो ये भी हैं कि प्‍यार सिर्फ पाने का नाम नहीं, अपने प्‍यार की खुशी में त्‍याग करना भी प्‍यार ही है... पर क्‍या मौजूदा दौर में ये संभव है... ये किताबी बातें हैं.....
    एक गजल की चंद लाईनें पेश कर रहा हूं,
    ''हम दोस्‍ती अहसान वफा सब भूल गए हैं,
    जिंदा तो हैं पर जीने की अदा भूल गए हैं।''


    बहरहाल, आपने अच्‍छे शब्‍दों में पिरोकर और सटीक उदाहरण के साथ दोस्‍ती और प्‍यार को महसूस कराया....
    आभार आपका...................

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  3. दोस्ती की बुनियाद यदि ईमानदारी की ईंटों पर पड़ी है तो यक़ीनन इस दुनिया में इससे बेहतर कुछ भी नहीं...मुझे मेरे परिवार से ज़्यादा साथ दोस्तों का मिला...जिसने मुझे इस रिश्ते की अहमियत को ज़्यादा से ज़्यादा समझने का मौक़ा मिला..आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर एक गीत ज़बान पर आ गया..."यारी है ईमान मेरा...यार मेरी ज़िंदगी..."

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