Saturday 20 August 2011

I LOV MY PRINCESS...

मोनिशा सेन नामक एक मोहतरमा का बेहद प्यार भरा और भावुकतापूर्ण लेख पढा,जिसमें उन्होनें अपनी छोटी सी बिटिया का बचपना और अठखेलियों का वर्णन  अत्यंत साधारण और सरल शब्दों में किया था। और लेख का अंतिम वाक्य था कि-“ मेरी प्यारी बेटी तुम छोटी ही रहो और जल्दी –जल्दी बडी मत बनो वरना मुझे तुम्हारे सहारे जीना छोड्ना पडेगा” ॥
    जिस प्रकार पिता अपने पुत्रों के माध्य्म से अपना बचपन जीते हैं, उसी तरह माएं अपनी बेटियों को अपना बचपन और यौवन समझतीं हैं।पुत्र पर पिता का नियंत्रण युवावस्था आते तक शिथिल हो जाता है;जबकि बेटी की युवावस्था में माताओं को ना चाहकर भी कठोर और अव्यवहारिक अनुशासन रखना पडता है। बचपन में बाप की गोद में तुतलानें और ईठलाने वाली उनकी ‘गुडिया’,,जवानी की दहलीज़ पर ही उनसे अनावश्यक दूर हो जाती है।पिता स्वंय एक अनकहा अंतराल रखने लगते है और घर बाहर की बडी महिलाएं उनको इस तरह पोषित करती हैं मानो वह बडी होकर कोई अपराध कर रही है।इसलिए समान परवरिश प्राप्त करने पर भी लडकियां, लड्कों की तुलना में शीघ्र परिपक्व हो जाती है।
बेटियां मां के संरक्षण में बडी होती है इसलिए हर बेटी अपनी मां की प्रतिकृति होती है।बेटों के माध्यम से माता-पिता अपने सपनों और अरमानों को पूरा करते है और बेटियां उनका सम्मान होती है जो हर उम्र और हर दुख में उनके साथ खडी रहती है।
“जब वी मेट” में एक सम्वाद का दुहराव हास्य उत्पन्न करने के लिए किया गया है कि,,जवान लड्की खुली तिजोरी की तरह होती है॥ जबकि ज़माना इस क़दर असुरक्षित है कि जिसने अपने भय पर विजय नही पाई और आत्मविश्वास ख़ो दिया,वह लुटेगा ही। और यह लूट लिंगभेद नही करती। कहने का मतलब ये है कि सभी खुली तिजोरी बन चुके है।
    बेटियों की भूमिका और स्थान बदल चुके है,,फ़िर भी जो एक चीज़ नही बदली है वो है बेटियों का प्यार भरा ‘दिल’; आज वो हर मां का दिल और बाप की नाक सम्भाल रही है॥टीवी पर बेटियों पर आधारित सीरियलों की बाढ आई है और वे माताओं की कमज़ोर नस को छू रहें है।जिस प्रकार हर सास,बहू का प्रगतिवादी रुप है,उसी तरह हर बेटी मां बनकर ही मां-बेटी के खूबसूरत रिश्तें को समझ पाती है।मेरा ये लेख बेटीयों के माता पिता को ज़रुर पसंद आएगा,,क्योंकि ये मेरे भी दिल के क़रीब है॥हर बेटी के मां –बाप की यही पीडा होती है शायद—
“जब बिटिया आई थी घर में,आंखों से खुशियां छलकी थी
भूल गए थे एकदिन दिल से,इस हिस्से को जुदा होना भी है”

2 comments:

  1. बेहतरीन पोस्‍ट।
    सच कहा आपने।
    कभी कभी लगता है बेटी बडी न हो... वरना जिसे गोद में पाला.. संभाला उसे बिदा करना पडेगा।
    ''अभी कल ही मैं अपनी बेटी को सुला रहा था, सोफे पर लेटकर उसे अपने सीने में लिटाकर। मैंने उसे कहा, देवी आप जब छोटे थे तो आपका सिर मेरे सीने में और पैर मेरे कमर तक आते थे पर अब आप का पैर मेरे घुटने तक आ रहा है... बेटा आप छोटे ही रहो बडे मत होना....''

    सच है, बेटियां जितने करीब होती हैं मां बाप के, जो अपनापन बेटियों से मिलता है, वो बेटों से नहीं मिल पाता और एक दिन बेटी को विदा करना पडता है.....
    इस पोस्‍ट को पढकर उस दिन की कल्‍पना से मन कांप रहा है जब बेटी को विदा करने का अवसर आएगा.........

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  2. पिता बनने का सौभाग्य मिला तो यक़ीनन एक बेटी का बनना चाहूंगा जिसके सामने मैं अपने वो सपने सच करने का प्रयास करुंगा जो कभी अपने लिये देखे थे....लाजवाब पोस्ट के लिये साधूवाद आपको...

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