Monday 15 August 2011

ये है देश की धडकन॥

फ़ुरसत आज कल नसीब वालों को मिलती है,,कल मेरा भी भाग्य जाग गया था;आज फ़िर सो गया।और ये फ़ुरसत मिली भी तो कहाँ ट्रेन में……।रेलगाडी की अपनी अलग ही दुनिया है ना !!देश में कुछ भी हो जाए,पर रेलें हडताल पे नही जाती॥क्योकि वही ज़िन्दगी की रफ़्तार भी सम्भालती हैं॥ मुझे तो ये चलता फ़िरता भारत लगती हैं,,सच भी है; हर स्टेशन पे बदलते चेहरे, सबके अलग अंदाज़,अपनी अपनी कहानी,अलग परिवेश, अलग भाषा और अलग ही दुनिया;फ़िर भी हमसफ़र बन जाते है।कुछ की मंज़िलें भी एक ही होती है लेकिन फ़िर राहें जुदा –जुदा। बडी ही मज़ेदार और अनोखी होती है ये पटरी वाली दुनिया…॥
        आप चाहे लाख सुविधाएं जुटा लिजिए,,हवाई यात्रा और ट्रेन की एसी का बडा “अनबोला” सा व्यवहार ,सामान्य और दूसरे दर्जे का मुकाबला नही कर सकता॥ सबकी जेब में इतने पैसे तो होते ही हैं कि, वो एक अदद अख़बार खरीद कर पढ सके,मगर नही; एक ही अख़बार के अलग अलग पन्ने विभिन्न्न हाथों में होते है।ये महज़ एक तरीका होता है,सामने वाले अपरिचित से बात शुरु करने का॥ कोई ज्वलंत मुद्दा हो तो फ़िर बयान,व्याख्यान और बहस इस तरह होती है,मानो जीतने वाले को कोई पुरस्कार मिल जाएगा।बहस में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने सम्पूर्ण  ज्ञान का प्रदर्शन  करना चाहता है॥मूंगफली खाते हुए लोग,घर से लाए खाने की  अलग अलग खुश्बू,पानी की बोतलें।बहुत सारी जिज्ञासु और कुछ शरारती आंखें……ये नज़ारा होता है, स्लीपर कोच का।पहचान बढाने के लिए सामने वाले के बच्चे को प्यार करना शुरु करते है लोग,और फ़िर शुरु होता हैबातचीत और रिशतों का नया सिलसिला।पहचान बढकर आत्मीयता में बदल जाती हैऔर,,’भाईसाहब आप भी एक परांठा लिजिए ना” पर खत्म होती है॥ भाईसाहब भी कृतज्ञता का निर्वहन करते है कि॥“ज़रुर लूंगा,पहले आप ये दाल मोठ लें,घर के बने है जी”॥
   मैनें कुछ पत्रिकाओं में पढा है (वो जिनमे लोग अपने अनुभव बताते है ना) कि,लोगों को ट्रेन में प्यार भी हुआ है।एक फ़िल्म में देखा था;हीरो ,हीरोईन को बचाता है,फ़िर उन दोनो में कुछ कुछ हो जाता है। मै ऐसे किन्ही लोगो को नही जानती जिनके साथ ऐसा हुआ हो,,मगर मेरी बहुत सी सहेलियों को ट्रेन में ज़बरदस्त छेडछाड का भयानक अनुभव हुआ है॥पता नही,लोग कैसे ताकाझांकी,इशारेबाजी इन सबको भी टाईमपास बनाकर सफ़र काट लेते है,,वो भूल जाते है कि उनके घर की स्त्रियों को भी यही सब सहना है॥
बहरहाल कहना यही है कि, भारत का सबसे बडा रोजगार देने वाला ये साधन देश की गति के समानांतर बहने वाली धारा है;जिसमें देश के प्राण बसते है।मुझे बचपन कि वो लडाई याद है,जिसमे मै और मेरा भाई,खिडकी के पास वाली सीट पे इसलिए बैठा करते थे ताकि  पेडों को तेजी से भागते हुए और पटरियों को हिलते हुए देख सके,,साथ में प्लेटफॉर्म  के मज़ेदार नज़ारे और खाने की चीजों पर बराबर ध्यान रहने की सुविधा  मिलती थी वो भी मुफ़्त मुफ़्त मुफ़्त॥ और मुझे नही लगता इन सबका आकर्षण कभी खत्म होता है।
आज लोग भले ही फ़्लाईट्स में आसमान छू रहे हैं मगर भारत दर्शन तो ट्रेनों में ही सम्भव है …।

5 comments:

  1. Jb desh k upr baat aati h to sbhi aage aate hn lekin...jb unme se hi kisi ko ye kartvya smbhalne ko kaha jata h to sb apne kdm samet lete hn...

    pr aapne jo kuch b kaha wo sahi h....

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  2. स्वधा जी,
    आप सही कह रहे हो...आज भारतीय रेल बहुत से कारणों से पसंद की जाती है...यह सबसे सुरक्षित और आरामदेह साधन हे...और आजकल तो टिकेट लेने क लिए भी लम्बी कतारों में लगने की जरुरत नहीं रही. घर बेठे बेठे इन्टरनेट के माध्यम से टिकेट ली जा सकती है...बस अगर रेलगाड़िया अगर अंदर से सुंदर और साफ़ हो जाएँ तो सभी इसी से सफर को अहमियत देने लगेंगे....
    For Tickets : www.irctc.co.in पे लोगिन करें....
    धन्यवाद

    नवीन जैन

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  3. nice one swadha aapane to diil ki baat dee....rail yatraa mere liye kisi bhi mukaam main mere payaare bharat ki yatraa se kum nahi lagataa hai......padosi se dunia jahaan ki baateen ....koochh aapani koochh parayee.....dilon main apanapan........ye hazaron kilometer ki yatraa yun chutakiyon main hotee hai...kass bhartiya rail itani saaf sootharee hotee.........

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  4. बेहतरीन प्रस्‍तुतिकरण।
    सच में भारतीय रेल का और उसमें भी सामान्‍य दर्जे और स्‍लीपर दर्जे की यात्रा का अपना अलग ही मजा है।
    कई रिश्‍ते बनते हैं।
    सच कहूं तो आपके इस पोस्‍ट को पढकर ऐसा लगने लगा था मानों मैं रेलगाडी में सफर कर रहा हूं और...... और......

    एक बार फिर बहुत बढिया .....

    शुभकामनाएं आपको बेहतर लेखन के लिए.........

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  5. स्वधा जी, आपके इस लेख ने मुझे अपने पहले प्यार की याद दिला दी

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