Thursday 18 August 2011

"बूद्धूबक्सा"

“ज़िंदगी मिलेगी ना दोबारा” यही नाम है उस नई फ़िल्म का, जिसमें  एक दृशय में तीन मित्र फ़ुरसत के पलों में पुराना दौर याद करते है और दूरदर्शन की प्रारंभिक सकेत ध्वनि का मख़ौल  उडाते है॥मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये पसंद नही आया;क्योकि दूरदर्शन और आकाशवाणी कोई मज़ाक की विषयवस्तु नही अपितु राष्ट्रीय दस्तावेज की तरह है॥हमारे लोकगीत –संगीत,परम्परा और सांस्कृतिक  धरोहरों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आज भी यही निभा रहें है,,और ये बात उतनी ही सच है,जितने कि दिन और रात का होना॥
सभी को वो पुरानी बाते याद ही होंगी,,जब हम दूरदर्शन पर प्रसारित कृषि-दर्शन को भी बडे चाव से देखते थे। हफ़्ते भर के इंतज़ार के बाद सप्ताह मे एक दिन(जो बाद मे दो दिन आने लगा),फ़िल्मी गीतों का आधे घंटे का बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘चित्रहार’ आता था,जिसके लिए मां और दीदीयां अपना काम जल्दी खत्म कर लेती थीं,शायद ही कोई इसे देखना छोडता होगा। आज टीवी पर कितने ही म्यूज़िक चैनल है परंतु लोगों के पास ना समय है ना रुचि।
   20 सालों में मैनें स्वयम दुनिया को बदलते देख लिया है; पहले आने वाले ‘धारावाहिक’ अब ‘डेली सोप’ बन चुके हैं। मै उस दौर की बात कर रही थी ,जब आदर्शों और साहित्यिक चरित्रों पर आधारित स्वच्छ छवि के धारावाहिक लोग रुचि के साथ देखते थे। प्राइवेट चैनल्स की बाढ दूरदर्शन की इस सफ़ाई और आदर्शवाद  को अपने साथ बहाकर ले गई है।कहते है ना,,कि हमेशा खुश रहने के लिए ;हमेशा सही होना भी ठीक नही होता। तो आज का नज़ारा ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग दूरदर्शन  की अपेक्षा नंग-धडंग चैनल्स देखना पसंद करते है।
इस लेख को पढने वालों को ये सब पढ्कर अच्छा लग रहा होगा और खुद लिखने वाली मुझको भी केवल लिख कर ही भडास निकालनी है, देखना तो वही ‘एम-टीवी’ या ‘ज़ी’ ही है। क्योकि किसी को कोई रुचि नही रही,सामाजिक सरोकार के धारावाहिक बनाने में या देखने में। और जो लोग पसंद कर रहे है,उसी को दिखाने के चक्कर में,दूरदर्शन भी अपनी स्वाभाविकता और देसीपन खो बैठा। फूहडता की आंधी में ये बूद्धूबक्सा भी अन्य चैनलों से होड करने की फ़िराक में वाहियात पन पर उतर गया; और अब जब लोग पुन: भली चीज़ें देखना चाह रहे हैं तो उनके पास कोई विकल्प नही है,सिवाय धार्मिक चैनल्स के जिसमे आधे समय ‘कवच’,रुद्राक्ष, या यंत्र बेचे जाते है।या फ़िर ‘योग’, प्राणायाम और ज्योतिष दिखाया जाता है।
    बहरहाल मै उस दौर को शिद्द्त से ‘मिस’ करती हूं और चाहती हूं कि दूरदर्शन फ़िर से वापसी करे॥इस बार लोग उसका इन्तज़ार कर रहें है,,क्योकि सभी को अपना बीता हुआ हसीन कल आजीवन लुभाता है॥ आइए सिर्फ़ इतना करें कि सार्थक और अच्छी चीज़ें देखे,,ताकि सामाजिक भला भी हो।

5 comments:

  1. स्वधा जी,

    पहले तो जो आपने नाम दिया है television को वो बहुत पसंद आया मुझे.... आपके लेख हमेश ही सच्चाई से प्रेरित होते हैं.. दूरदर्शन अगर आज अपने प्रसारण में आधुनिकता ले आये और उनका presentation भी दुसरे channels जितना ही बढिया हो जाये तो उने अपने प्रोग्राम को बदलने की जरुरत नहीं है.....लोग आज भी "बुनियाद" और "हम लोग" जैसे धारावाहिक देखना पसंद करेंगे.....

    ReplyDelete
  2. बढिया विश्‍लेषण।
    मुझे वो दिन आज भी याद है जब दूररर्शन में चित्रहार आता था।
    एक कार्यक्रम और है, नाम याद नहीं आ रहा पर उसे तबस्‍सुम प्रस्‍तुत करती थी। पूरे हफ्ते आने वाले कार्यक्रमों और फिल्‍मों की सूची इसमें होता था। इस कार्यक्रम को बडे ध्‍यान से देखते थे हम और एक डायरी में नोट करते थे कि किस दिन किस समय कौन सा कार्यक्रम प्रसारित होगा। फिर पूरे हफ्ते की दिनचर्या इस सूची को देखकर तैयार करते थे।
    ये भी याद है कि जब महाभारत और रामायण सीरियल आता था तो घर की और आसपास की बडी बुजुर्ग महिलाएं टीवी के सामने आसन लगाकर बैठ जाती थीं और उनके हाथ में नारियल तक होते थे। टीवी स्‍क्रीन में जब राम और कृष्‍ण बने पात्र आते थे तो ये बुजुर्ग महिलाएं प्रणाम करने की मुद्रा में आ जाती थीं......

    और भी बहुत से किस्‍से हैं.......

    मैं इस बात से सहमत नहीं कि दूरदर्शन को आधुनिकता के चक्‍कर में आना चाहिए.... ये भेडचाल है जो सब कर रहे हैं और अति का अंत एक दिन होगा ही.....

    मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं कि ऐसे समय में जब मनोरंजन चैनल घटिया सीरियलों और उत्‍तेजक कार्यक्रमों के जरिए लोगों को आकर्षित करने में लगे हैं... दूरदर्शन सामाजिक सरोकार को लेकर अडिग है। जहां तक न्‍यूज की बात है..... सनसनी फैलाने वाले दौर में सही खबरों के लिए दूरदर्शन का मुकाबला नहीं.... बाकी चैनल तो अपने ''व्‍यूज'' में उलझे रहते हैं और खबर की आत्‍मा कहां चली जाती है, पता ही नहीं चलता....''न्‍यूज'' तो दुरदर्शन में ही दिखता है.....
    एक बार फिर आपका आभार.... हमारे आसपास की बातें जिसे महसूस करते हैं पर व्‍यक्‍त नहीं कर पाते हैं उसे शब्‍द देने के लिए,
    शुभकामनाएं आपको................

    ReplyDelete
  3. मेरा सोचना कुछ और है , हमें परोसा वही जाता है जो हम चाहते है , पहले अपने स्वाद को बदलना होगा हम चाहते ही तो यही है , माँगा ही यही जाता है फिर देने वाले का क्या दोष , कई चेनल है जहा से हम अच्छा पा सकते है ! हम राज हंश क्यों नहीं बनाते जो दूध और पानी में से दूध को ग्रहण कर ले पानी छोड़ दे ! मै आपकी सोच का सम्मान करता हू., लेखनी पर वजन पा रहा हू , भूसे के ढेर में से दाना निकालने के प्रयास के लिए साधुवाद देता हू , सफल - सार्थक प्रयास ..............कुछ बदलाव के लिए ...!

    ReplyDelete
  4. Swadha ji aap ne aaj ke daur me aisa katheen lekin sahi subject uthaya hai jispar log sahmat to aasani se ho jayenge lekin palan koi nahi karna chahta,mujhe yaad hai mai science collage raipur me padta thha 1982 -1987 tak ki baat hai sirf puri collage me ek hi buddhubix hua karta thha hostel s me nahi thha tab chaitrahaar ke samay use on karne ke liye bakaida principal ke se permission leni padti thhi aur uske baad samachaar dekhne ki koshish karne par peon tv band kar deta thha aur hum log chup chaap vapas aa jate thhe ab vahsipan aap apne mobile me dekh lijiye lekin achchha karyakram kahi bhi nahi dekh sakte wo puraane jamaane ki baat ho gayee.

    ReplyDelete
  5. bahut khoob kaha aapne..I agree...accha likhti hai aap likhti rahiye aur sabse share karti rahe...

    ReplyDelete